ना डेटा ना फोन..रोटी खाएं या रिचार्ज कराएं

संपादकीय , 3061

जब से भारत में लाॅकडाउन लागू हुआ सरकार ने शैक्षिक संस्थाओं को निर्देश दिये हैं कि आनलाइन कक्षायें शुरू की जायें, जिससे बच्चों की पढ़ाई में कोई समस्या न आये। सरकारी स्कूलों के लिए भी ये निर्देश दिये गये हैं। उत्तर प्रदेश में भी प्राइवेट समेत सभी सरकारी स्कूलों में आनलाइन कक्षायें शुरू की गयी हैं। जब से भारत में लाॅकडाउन लागू हुआ तब से ये बात बार-बार कही गई है किन्तु इस बात पर बार-बार सबका ध्यान आकर्षित  करते रहने की है। आज एसी कमरों में बैठे समाज के धनी-मानी तबके अक्सर अपनी स्थिति जैसी ही पूरे समाज की स्थिति का आंकलन कर लेते हैं। इसिलिए इन दिनों आॅनलाइन शिक्षा का खूब महिमामंडल किया जा रहा है, किन्तु कुछ मूर्खों को यह याद दिलाते रहने की जरूरत है कि यह सुविधा सबको हासिल नहीं है। पहले नोट बन्दी और उसके बाद करोना जैसी भयावाह बीमारी की वजह से लागू किए गए लाॅकडाउन में कितनों के रोजगार चले गए लोगों की नौकरिया चली गई। आज गाॅंवों बसे गरीब किसान/मजदूर परिवार हों या शहर में रहने वाले गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले परिवार कठिनाइयों के दौर से गुजर रहे हैं। और तो और बड़े बड़े स्कूलों में बच्चों को पढ़ाने वाले कुछ परिवारों को स्कूलों की फीस देने तक के लाले पड़ रहे हैं। मगर इन सब बातों को नज़र अन्दाज कर सिर्फ एक राग ही अलापा जा रहा है आॅनलाइन शिक्षा आॅनलाइन शिक्षा। एसी में बैठे हजूरों को ये नहीं पता  जिसके पास इस माहौल में परिवार चलाना मुश्किल हो रहा है वो एन्डराॅइड फोन और इन्टरनेट डेटा कहां से खरीदेगा। आजकल बेसिक शिक्षा विभाग के महानिदेशक इस पर कुछ ज्यादा उतावले नज़र आ रहे हैं। मार्च में लागू किए गए लाॅकडाउन के समय से ही व्हाटसएप पर बच्चों का ग्रुप बना कर उन्हें पढ़ाने का राग अलापकर शिक्षकों पर नित नया दबाव बनाते रहे है। स्कूलों को ना तो मोबाईल फोन ही दिया और ना ही इन्टरनेट डेटा मगर फिर भी मरता क्या न करता.... शिक्षक ने अपने पास से डेटा खर्च कर छात्र हितों को ध्यान में रखते हुए कुछ बच्चों को अपने प्रयास से जोड़ा और पढ़ाना भी शुरू कर दिया। मगर ये उसमें भी बाधा उत्पन करते है रोज सैकड़ों वीडीयो भेजकर जिनमें न जाने कितने जीबी डेटा खर्च होता है। खुद जनाब सरकारी खर्चे पर करते हैं मगर शिक्षक और गरीब परिवारों के बच्चे अपने पास से, मगर इनको ये नहीं पता ऐसा कुछ बच्चों के परिवार ही कर पा रहे हैं वो भी शिक्षकों के दबाव में बामुश्किल। शायद जनाब ये नहीं जानते, ये बात एक बार फिर संयुक्त राष्ट्र की एजेंसी यूनिसेफ के एक अध्ययन से सामने आई है। उस अध्ययन से पता चला है कि कोविड-19 महामारी और स्कूलों के व्यापक तौर पर बंद होने से दुनिया में जितने बच्चे प्रभावित हुए हैं, उनमें से कम से कम एक-तिहाई बच्चों तक वर्चुअल शिक्षा पहुंच नहीं पा रही है। यूनिसेफ के के मुताबिक पूरी दुनिया में करीब 46.3 करोड़ बच्चे ऐसे हैं, जिनके पास दूर से शिक्षा ग्रहण करने के लिए या तो उपकरण नहीं है या इलेक्ट्राॅनिक पहुंच नहीं है। इस संस्था के एक बयान में कहा गया कि ऐसे बच्चे जिनकी शिक्षा महीनों तक पूरी तरह से बाधित हो गई थी, उनकी अगर कुल संख्या देखें तो ये शिक्षा का एक वैश्विक आपातकाल लगता है। इसके नतीजे समाजों में और अर्थव्यवस्थाओं में आने वाले दशकों तक महसूस हो सकते हैं। संयुक्त राष्ट्र का अनुमान है कि महामारी की वजह से जो तालाबंदी लगी और स्कूल बंद हुए उस से दुनिया में करीब डेढ़ अरब बच्चे प्रभावित हुए हैं। यूनिसेफ की रिपोर्ट में दूर से मिलने वाली शिक्षा तक पहुंच पाने में बच्चों के बीच भौगोलिक अंतर को भी रेखांकित किया गया है। उदाहरण के तौर पर अफ्रीका या एशिया के कुछ हिस्सों के मुकाबले यूरोप में काफी कम बच्चे प्रभावित हुए हैं। रिपोर्ट लगभग 100 देशों से लिए गए डेटा पर आधारित है। इस डेटा के जरिए इंटरनेट, टीवी और रेडियो तक लोगों की पहुंच को मापा गया। वैसे रिपोर्ट में कहा गया है कि यह संभव है कि जिन बच्चों के पास ये साधन हैं, उन्हें दूसरी तरह की अड़चनों का सामना करना पड़ रहा होगा। तो भइया फिर काहे का आॅनलाइन शिक्षा का महिमामंडल और इस पर जोर। पहले छात्रों और शिक्षकों को मोबाईल फोन और बच्चों और स्कूलों के लिए हाई स्पीड इन्टरनेट की व्यवस्था करें फिर उसके बाद शिक्षकों की चाभी कसें। अभी तो काम तुम्हारा नाम हमारा वाली कहावत को सत्य करने का प्रयास जारी रखे हैं जनाब, इससे कुछ हासिल नहीं होगा थोड़ा एसी से बाहर निकल कर गरीब के छपरे में बैठकर मंथन करें। सरकारी स्कूलों का बहुतायत गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन कर रहे परिवारों या उससे थोड़ी बेहतर स्थिति में जीने वाले लोगों का है। यानी जिन परिवारों की प्रतिमाह की कमाई 10 हजार से भी नीचे होती है, और लॉकडाउन ने जिनकी कमर तोड़कर रख दी है, खाने के लाले पड़े हैं, उनके बच्चे एंड्रायड फोन से आनलाइन पढ़ाई भला कैसे कर पायेंगे। बड़ा सवाल ये कि गरीब परिवारों से आने वाले बच्चों के अभिभावक लॉकडाउन के बीच रोटी खाएं या रिचार्ज कराएं--??

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