दिल्ली दंगे: जमानत पर सुप्रीम कोर्ट का नया पैमाना और नागरिक स्वतंत्रताओं पर उठते सवाल

राष्ट्रीय , 131

फरवरी 2020 के दिल्ली दंगों के मामले में गिरफ्तार युवाओं की जमानत अर्जियों पर फैसला सुनाते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने एक नया पैमाना स्थापित किया है। कोर्ट ने ‘घटना में भागीदारी के श्रेणीक्रम’ के आधार पर यह तय किया कि पांच अभियुक्तों को जमानत दी जा सकती है, जबकि उमर खालिद और शरजील इमाम को यह राहत नहीं मिलेगी।
हालांकि, इस फैसले में नागरिक अधिकारों के दृष्टिकोण से एक चिंताजनक बात यह भी कही गई कि अवैध गतिविधि निरोधक कानून (यूएपीए) से जुड़े मामलों में सुनवाई में हो रही देरी को जमानत का आधार नहीं बनाया जा सकता। बेहतर होता कि अदालत यह भी स्पष्ट करती कि ऐसी देरी की स्वीकार्य सीमा क्या हो सकती है।
उमर खालिद और शरजील इमाम पांच वर्ष से अधिक समय से जेल में हैं, जबकि निचली अदालत में अभी तक मुकदमे की जिरह भी शुरू नहीं हुई है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या सुप्रीम कोर्ट की यह जिम्मेदारी नहीं बनती कि वह मुकदमों में अत्यधिक देरी के लिए जवाबदेही तय करे? अन्यथा, न्यायिक प्रक्रिया ही दंड का रूप ले लेती है।
एक और अहम सवाल यह है कि जब निचली अदालत में साक्ष्यों का न्यायिक परीक्षण अभी हुआ ही नहीं है, तो यह कैसे तय किया जा सकता है कि किसी घटना में किस अभियुक्त की भागीदारी का स्तर क्या था। खासतौर पर तब, जब दिल्ली दंगों से जुड़े कुछ मामलों में निचली अदालतों ने चार्जशीट और पुलिस जांच की गुणवत्ता पर गंभीर टिप्पणियां की हैं।
यदि आगे चलकर मुकदमे की कार्यवाही में इन अभियुक्तों के खिलाफ पेश किए गए साक्ष्य टिक नहीं पाते, तो उनके जीवन के वे कीमती वर्ष, जो जेल में बीत चुके हैं, उसकी भरपाई कैसे होगी? दिल्ली दंगों के पीछे किसका हाथ था, इस बारे में फिलहाल केवल अभियोजन पक्ष का पक्ष सामने है। अभियुक्तों का पक्ष तो जिरह के दौरान ही सामने आ सकेगा।
दंगों के पीछे कौन था और किसने क्या भूमिका निभाई—इन सवालों पर अभी किसी ठोस निष्कर्ष पर पहुंचना संभव नहीं है। ऐसे में साजिश में भागीदारी या भूमिका की श्रेणीबद्धता से जुड़ी सभी बातें फिलहाल आरोप मात्र हैं। बावजूद इसके, सुप्रीम कोर्ट ने इन्हीं आरोपों को जमानत का पैमाना बनाया है। नागरिक स्वतंत्रताओं के लिहाज से यह फैसला चिंता पैदा करता है।

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