अमेरिकी टैरिफ की धमकी और भारत की निर्यात कमजोरी: क्यों बेबस दिखता है नई दिल्ली?
राष्ट्रीय Jan 07, 2026 at 06:17 AM , 134अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने संकेतों की भाषा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर दबाव बनाते हुए चेतावनी दी है कि यदि उन्हें संतुष्ट नहीं किया गया तो भारत पर और टैरिफ लगाए जा सकते हैं। इस बयान भर से ही देश के कारोबारी जगत में बेचैनी फैल गई है।
फेडरेशन ऑफ इंडियन एक्सपोर्ट ऑर्गनाइजेशन्स (FIEO) ने चेतावनी दी है कि यदि अमेरिका मौजूदा 50 प्रतिशत टैरिफ को और बढ़ाता है, तो भारतीय निर्यात पर इसका गंभीर नकारात्मक असर पड़ेगा। खास तौर पर पारंपरिक निर्यात क्षेत्रों को इससे सबसे अधिक नुकसान होने की आशंका है।
थिंक टैंक ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) के अनुसार, पहले से लागू अमेरिकी टैरिफ के चलते मई से नवंबर के बीच अमेरिका को होने वाले भारतीय निर्यात में 20.7 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। यदि टैरिफ और बढ़ाए गए, तो यह गिरावट और तेज हो सकती है।
GTRI ने यह भी रेखांकित किया है कि भारत के पास रूसी तेल के सबसे बड़े खरीदार चीन जैसी सौदेबाजी की ताकत नहीं है। यही कारण है कि हाल के महीनों में अमेरिका से तेल की खरीद दोगुनी करने के बावजूद ट्रंप लगातार भारत को धमकियां देते रहे हैं।
सवाल यह है कि अमेरिका के सामने भारत इतना लाचार क्यों नजर आता है? इसका जवाब काफी हद तक भारत की आंतरिक कमजोरियों में छिपा है। हाल ही में एक आरटीआई आवेदन के जवाब में केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय ने स्वीकार किया कि भारतीय निर्यात में गिरावट का कारण केवल अमेरिकी टैरिफ नहीं है। लागत सामग्रियों की बढ़ती कीमतें, अंतरराष्ट्रीय मानकों की जांच के लिए पर्याप्त सुविधाओं का अभाव और शिपिंग कंटेनरों की कमी भी निर्यात के रास्ते में बड़ी बाधाएं हैं।
इन समस्याओं को लेकर नवंबर में भारतीय निर्यातकों ने वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल को अवगत कराया था। ऐसे समय में, जब ट्रंप प्रशासन की एकतरफा कार्रवाइयों ने वैश्विक व्यापार के पुराने नियमों को कमजोर कर दिया है, केंद्र सरकार और उद्योग जगत को इन बुनियादी समस्याओं के समाधान को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी चाहिए थी।
भले ही टैरिफ अचानक लगाए गए हों, लेकिन निर्यात से जुड़ी इन संरचनात्मक कमजोरियों पर ध्यान पहले से दिया जाना चाहिए था। इन्हीं रुकावटों के कारण भारत के लिए वैकल्पिक बाजारों तक पहुंच बनाना भी कठिन हो गया है। नतीजतन, ट्रंप की धमकियों को चुपचाप सुनना भारत की मजबूरी बनता जा रहा है।






























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