चुनावी तोहफे और बढ़ती देनदारियाँ

संपादकीय , 109

चुनाव नज़दीक आते ही राज्यों में लोकलुभावन घोषणाओं की बाढ़ आना अब सामान्य राजनीतिक प्रवृत्ति बन चुकी है। असम और तमिलनाडु की हालिया घोषणाएँ इसी सिलसिले की अगली कड़ी हैं, जहाँ तात्कालिक राजनीतिक लाभ के लिए दीर्घकालिक वित्तीय दायित्व खड़े किए जा रहे हैं।
असम सरकार ने विधानसभा चुनाव से पहले मुख्यमंत्री महिला उद्यमिता योजना की घोषणा की है, जिसके तहत 37 लाख महिलाओं के खातों में 8,000 रुपये ट्रांसफर किए जाएंगे। योजना का उद्देश्य भले ही महिला सशक्तिकरण बताया जा रहा हो, लेकिन इससे राज्य के खजाने पर लगभग 30,000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा। सवाल यह है कि क्या राज्य की वित्तीय स्थिति इस भार को लंबे समय तक वहन करने में सक्षम है?
उधर, तमिलनाडु में अगले वर्ष होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले सरकार ने अपने कर्मचारियों को साधने की दिशा में बड़ा दांव खेला है। तमिलनाडु एश्योर्ड पेंशन स्कीम के तहत सेवानिवृत्त कर्मचारियों को अंतिम वेतन का कम से कम 50 प्रतिशत पेंशन देने और 25 लाख रुपये तक ग्रेच्युटी सुनिश्चित करने का ऐलान किया गया है। इसके लिए कर्मचारियों का योगदान केवल 10 प्रतिशत होगा, जबकि शेष पूरा बोझ राज्य सरकार उठाएगी। फिलहाल इससे 13,000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त खर्च अनुमानित है, जो महंगाई के साथ हर साल बढ़ता जाएगा।
बुजुर्गों को सामाजिक सुरक्षा देना एक आवश्यक और मानवीय नीति है, लेकिन यह सुविधा केवल सरकारी कर्मचारियों तक सीमित क्यों हो? देश की बड़ी आबादी असंगठित क्षेत्र में काम करती है, जहाँ न पेंशन है और न सामाजिक सुरक्षा। ऐसे में सरकारी कर्मचारियों को एक अलग, सुविधा-प्राप्त वर्ग के रूप में स्थापित करना सामाजिक असमानता को और गहरा करता है।
नई पेंशन व्यवस्था इसी असमानता और बढ़ते वित्तीय दबाव को ध्यान में रखकर लागू की गई थी। अब चुनावी लाभ के लिए उसे पलटना न केवल नीति की निरंतरता को तोड़ता है, बल्कि भविष्य की सरकारों के लिए गंभीर आर्थिक चुनौतियाँ भी खड़ी करता है।
बेहतर होता कि सरकारें चुनावी वादों की बजाय एक ऐसी व्यापक सामाजिक सुरक्षा नीति पर काम करतीं, जो समाज के सभी वर्गों को न्यूनतम सुरक्षा प्रदान करे। लोकतंत्र में कल्याण आवश्यक है, लेकिन वह दूरदर्शिता और समानता के साथ होना चाहिए—न कि केवल वोट बैंक को ध्यान में रखकर।

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