बिखरते नैरेटिव्स और डगमगाता भरोसा: 2025 के अंत में भारत का आत्ममंथन

संपादकीय , 136

साल 2025 आज यह अहसास छोड़ते हुए विदा हो रहा है कि बीते दशक में जिन नैरेटिव्स ने भारत की आबादी के बड़े हिस्से को सम्मोहित कर रखा था, वे पिछले बारह महीनों में काफी हद तक बिखर चुके हैं। इस बदलाव को तीन प्रतीकों के जरिए समझा जा सकता है—डॉनल्ड ट्रंप, ऑपरेशन सिंदूर और भारतीय रुपया।
पिछले वर्षों में अमेरिका की सुरक्षा और विदेश नीति में भारत को विशेष तरजीह मिली थी। इससे पश्चिमी दुनिया में भारतीय नेतृत्व का कद बढ़ा हुआ प्रतीत होता था। लेकिन अपने दूसरे कार्यकाल में डॉनल्ड ट्रंप ने इस रणनीति में स्पष्ट बदलाव किया। ऐसा लगता है कि जिन लाभों का भारत ने अमेरिकी प्राथमिकता के दौर में आनंद लिया, अब ट्रंप प्रशासन उनकी कीमत वसूलने पर उतारू है। इसका सीधा असर भारत की अंतरराष्ट्रीय हैसियत और कूटनीतिक प्रभाव पर पड़ा है।
ट्रंप के टैरिफ युद्ध ने भारतीय अर्थव्यवस्था को भी गहरी चोट पहुंचाई। वहीं अमेरिका के भीतर उनकी आंतरिक नीतियों से उपजे विदेशी-विरोधी माहौल का सबसे नकारात्मक असर भारतीय मूल के लोगों पर पड़ा, जिसने प्रवासी भारतीय समुदाय के साथ-साथ देश के भीतर के मनोविज्ञान को भी प्रभावित किया।
इसी पृष्ठभूमि में ‘ऑपरेशन सिंदूर’ सामने आया। चार दिनों के इस सैन्य संघर्ष में भारत को जमीनी स्तर पर महत्वपूर्ण सफलताएं मिलीं, लेकिन अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत खुद को लगभग अकेला खड़ा पाता दिखा। वैश्विक मीडिया में उस नैरेटिव को प्रमुखता मिली, जिसे भारत चीनी प्रचार तंत्र के सहारे पाकिस्तान का दुष्प्रचार मानता है। इस पूरे प्रकरण ने विदेशों में अपनी बात प्रभावी ढंग से रखने की भारत सरकार की क्षमता को लेकर लोगों के भरोसे को कमजोर किया है।
आर्थिक मोर्चे पर हालात और चिंताजनक रहे। अमेरिकी टैरिफ, विदेशी निवेशकों द्वारा पूंजी निकासी, और भारतीय कारोबारियों का विदेशों में अवसर तलाशना—इन सभी कारकों ने मिलकर रुपये को रिकॉर्ड निचले स्तर तक पहुंचा दिया। इसका सीधा असर भारत की आर्थिक संभावनाओं और विकास की धारणा पर पड़ा। आईएमएफ द्वारा भारत के आर्थिक आंकड़ों को फिर से ‘सी ग्रेड’ में रखना इस चिंता को और गहरा करता है।
कुल मिलाकर, 2025 के अंत तक यह साफ दिखने लगा है कि भारतवासियों के भीतर यह विश्वास डगमगाने लगा है कि देश का उदय अपरिहार्य है और वह अवश्य ही विकसित राष्ट्र एवं वैश्विक महाशक्ति बनेगा। यह समय आत्ममुग्धता से बाहर निकलकर यथार्थपरक आत्ममंथन का है—ताकि बिखरते नैरेटिव्स की जगह ठोस नीतियां, विश्वसनीय कूटनीति और टिकाऊ आर्थिक रणनीति ले सकें।

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