महा-गठबंधन की राह आसान नहीं।

संपादकीय , 111

बिहार में महा-गठबंधन उद्देश्य की एकता का संदेश देने में विफल रहा है। इसके बदले उसकी छवि सत्ता संघर्ष में जुटे नेताओँ और गुटों के समूह की बनी है। गठबंधन की मुश्किलें अलग-अलग स्तरों पर हैं। पहला स्तर तो लालू प्रसाद यादव का परिवार है, जिसमें टूट-फूट की चर्चाओं और दुरभिसंधि की अटकलों से भ्रम लगातार गहराता गया है। इसी तरह कांग्रेस के भीतर टिकट बंटवारे को लेकर रिश्वतखोरी तक के इल्जाम लगे हैं, जिसका खराब असर गठबंधन की छवि पड़ा है। फिर घटक दलों का अपनी ताकत को लेकर पाला गया भ्रम है, जिससे सीटों का तालमेल बनाना कठिन साबित हुआ। राहुल गांधी को सोशल मीडिया पर मिले नए समर्थकों के आधार पर कांग्रेस के भीतर गलतफहमी बनी है कि गांधी की लोकप्रियता के कारण अब पार्टी अपनी ताकत जताने की हैसियत में है। फिर मुकेश सहनी जैसे नेता हैं, जिन्होंने खुद को उप-मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित करवाने की जिद ठानी है, जबकि कांग्रेस तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री का चेहरा मानने तक को तैयार नहीं है! यह अपने-आप में भ्रामक धारणा है कि किसी जाति विशेष से आए नेता उस पूरी जाति के वोट के मालिक हैं। चूंकि आरजेडी यादव वोटों को अपनी जागीर मानती है, तो उसके लिए यह सोचना आसान था कि सहनी को जोड़ने से मल्लाह और पशुपति पारस को जोड़ने से दलितों की कुछ जातियां महा-गठबंधन के हिस्से में आ जाएंगी। उधर कांग्रेस, लेफ्ट, जेएमएम आदि के साथ होने से गठबंधन की सेक्यूलर छवि बनेगी, जिससे मुस्लिम स्वतः इससे जुड़ने को मजबूर होंगे। अब साफ है कि ऐसी धारणा बनाना आरजेडी को महंगा पड़ा है। पारस और जेएमएम अलग हो चुके हैं, जबकि सहनी और कांग्रेस अपनी पूरी कीमत वसूल करने पर आमादा हैं। नतीजा महा-गठबंधन का चूं-चूं का मुरब्बा बन जाना है। इसका मुकाबला एनडीए से है, जिसमें वैसे तो अपने मतभेदों और टकराव की कमी नहीं है, लेकिन सेंट्रल लीडरशिप के दबाव में कुल मिलाकर सीटों का तालमेल तो बेहतर ढंग से हो ही गया है। फिर बीच में प्रशांत किशोर हैं, जिन्होंने अलग से अनिश्चितता जोड़ी हुई है, जिसने महा-गठबंधन की मुश्किलें और गहरा गई हैँ।

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