शिक्षा को पूर्ण स्वतंत्रता की आवश्यकता- राजेश दीक्षित

लखीमपुर खीरी , 212

लखीमपुर खीरी। शिक्षा किसी भी राष्ट्रजीवन का प्राणतत्व होती है। वह हमारे समाज जीवन का आधारभूत ढांचा है। किसी भी देश की शिक्षा उसकी राष्ट्रनीति का विषय होती है ना किसी संकुचित दलगत स्वार्थों को साधने का। शिक्षा को स्वायत्तता पूर्ण स्वतंत्रता की आवश्यकता है।देश की शिक्षा शिक्षाविदों के हाथ में होना चाहियें। इसे राजनीति से बाजारीकरण एवं ब्यूरो क्रेट्स तीनों के चंगुल से मुक्त कराना है। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की अपने स्थापनाकाल से यह मांग रही है कि केंद्रीय बजट का कमसे कम दस प्रतिशत शिक्षा पर व्यय हो।जो आज भी केवल दो प्रतिशत है। सरकारी व्यय के बावजूद भी शिक्षा की स्वायत्तता स्वतंत्रता वैसे ही आवश्यक है जैसे कि न्यायपालिका के न्यायाधीशों को वेतन सरकारी कोष से मिलता है मगर उसका प्रभाव उनके निर्णयों पर नहीं पड़ता है। न्यायाधीश सरकार के विरुद्ध भी निर्णय पूरी स्वतंत्रता से देते है। हमारी शिक्षा में देशभक्ति सामाजिक समरसता राष्ट्रीय एकात्मकता  उसका सनातन सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ाव केवल आवश्यकों नहीं अपितु अनिवार्य है। शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य एक परिपूर्ण एवं वास्तविक मानव का निर्माण करना है। जो आस्थावान हो अपने संपूर्ण समाज के प्रति संवेदनशील हो। जागरूक हो अपने उत्तरदायित्वों के प्रति अपने सामाजिक कर्तव्यों के प्रति।  शिक्षा राष्ट्रीय स्वाभिमान अस्मिताबोध आत्मगौरव आत्मविश्वास के भावक निर्माण  कर हमें पराभूत मानसिकता आत्मविस्मृति से मुक्त भी करती है।

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