आजादी के 78 साल बाद भी गुलामी का प्रतीक: लखीमपुर खीरी में 'विलोबी' का नाम शहीदों के शौर्य पर भारी

लखीमपुर खीरी , 32

(एनके मिश्र/केके शुक्ला)

​लखीमपुर खीरी। एक तरफ देश आजादी का अमृत महोत्सव मनाकर अपनी विरासत पर गर्व कर रहा है, वहीं उत्तर प्रदेश के जनपद लखीमपुर खीरी में आज भी एक ब्रिटिश कलेक्टर का नाम गर्व से 'विलोबी मेमोरियल हॉल' के रूप में चमक रहा है। यह वही विलोबी है, जिसे दमनकारी नीतियों के कारण 1920 में भारतीय क्रांतिकारियों ने मौत के घाट उतारा था। स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के आश्रितों और स्थानीय नागरिकों में इस बात को लेकर भारी आक्रोश है कि शहीदों की धरती पर अत्याचारी अंग्रेज का नाम अब भी क्यों बना हुआ है।
​इतिहास के पन्नों में दर्ज वीरता और बलिदान
​इतिहास गवाह है कि 26 अगस्त 1920 को लखीमपुर की धरती पर तीन जांबाज सपूतों— नसीमुद्दीन, माशूक अली और बशीर अली ने तत्कालीन ब्रिटिश कलेक्टर विलोबी की हत्या कर अंग्रेजी हुकूमत की चूलें हिला दी थीं। इन तीनों वीरों को बाद में फांसी की सजा दी गई।
​सिर्फ यही नहीं, जनपद के अन्य महान नायकों का बलिदान भी इस मिट्टी में समाहित है:
​राज नारायण मिश्र: जिन्हें कानपुर जेल में फांसी दी गई।
​रम्पा तेली: अंग्रेजों की सीधी गोली खाकर शहीद हुए।
​देवता दीन और नत्थू: जेल की काल कोठरी में सजा काटते हुए शहीद हो गए।
​पंडित राम आसरे शुक्ल और मुकुंद राम धवन: जिन्हें 12 बेंत मार कर शारीरिक प्रताड़ना दी गई।
​उत्तर प्रदेश सरकार ने इन सातों महानुभावों को शहीद का दर्जा दिया है, लेकिन विडंबना देखिए कि जिस प्रशासन को इनका स्मारक बनाना चाहिए था, वह विलोबी के नाम को संरक्षित करने में जुटा है।
​102 साल पुराना ट्रस्ट और विरासत का विवाद
​अंग्रेजों ने अपनी साख बचाने के लिए 1920 में विलोबी मेमोरियल हॉल और 1924 में एक ट्रस्ट का गठन किया था। ताज्जुब की बात यह है कि देश आजाद होने के बावजूद, आज 102 साल बाद भी उस ट्रस्ट का सचिव पद उसी परिवार के पास है जिसे अंग्रेजों ने नियुक्त किया था। स्थानीय लोगों का आरोप है कि यह व्यवस्था लोकतांत्रिक मूल्यों और स्वतंत्रता सेनानियों के सम्मान के विपरीत है।
​प्रशासन की चुप्पी पर उठते सवाल
​स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आश्रितों द्वारा कई बार विरोध प्रदर्शन किया गया और ज्ञापन सौंपे गए। हाल ही में जिलाधिकारी दुर्गा शक्ति नागपाल को भी इस संबंध में ज्ञापन दिया गया था। सैकड़ों समाचार पत्रों में प्रमुखता से खबरें छपने के बावजूद, जिला प्रशासन ने अब तक इस कलंक को मिटाने या नाम बदलने की कोई ठोस पहल नहीं की है।
​"यह सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि उन शहीदों के वंशजों के जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा है जिन्होंने देश की आजादी के लिए हंसते-हंसते फांसी का फंदा चूम लिया। आखिर कब तक हम गुलामी की इस निशानी को ढोएंगे?"
— स्थानीय निवासी एवं सेनानी आश्रित
​मांग: शहीदों के नाम पर हो 'नामकरण'
​जिले के प्रबुद्ध वर्ग और सेनानी आश्रितों की एक ही मांग है— विलोबी का नाम हटाया जाए और इस मेमोरियल हॉल का नाम शहीदों के नाम पर रखा जाए।
​अब देखना यह है कि प्रशासन कब नींद से जागता है और कब लखीमपुर खीरी को इस 'मानसिक गुलामी' के प्रतीक से मुक्ति मिलती है।

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