महिला आयोग या अराजकता का मंच? केजीएमयू में उपाध्यक्ष की मौजूदगी में तोड़फोड़ पर उठे गंभीर सवाल

जनपत की खबर , 125

लखनऊ।
केजीएमयू (किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी) में महिला आयोग की उपाध्यक्ष अपर्णा यादव की मौजूदगी में हुई तोड़फोड़ और हंगामे के बाद कई गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। इस मामले में दी गई पुलिस तहरीर में महिला आयोग की भूमिका और जिम्मेदारी को लेकर तीखी टिप्पणियाँ की गई हैं।
तहरीर के अनुसार, महिला आयोग की उपाध्यक्ष अपर्णा यादव के केजीएमयू पहुंचने से पहले ही कुलपति कार्यालय के बाहर सैकड़ों अज्ञात लोग जमा हो गए थे। जैसे ही अपर्णा यादव अपनी गाड़ी से उतरीं, भीड़ कुलपति के खिलाफ अभद्र नारेबाज़ी करते हुए आगे बढ़ने लगी। सुरक्षा में तैनात गार्डों ने भीड़ को रोकने का प्रयास किया, लेकिन उनके साथ धक्का-मुक्की की गई।
भीड़ के हिंसक होते ही शिक्षक और छात्र जान बचाकर इधर-उधर भागने लगे। आरोप है कि उपाध्यक्ष अपर्णा यादव के साथ मौजूद भीड़ जबरन कुलपति कार्यालय में घुस गई और वहां तोड़फोड़ शुरू कर दी। हालात बिगड़ते देख कुलपति को दूसरे गेट से सुरक्षित बाहर निकाला गया। इसी दौरान कुलपति का मोबाइल फोन भी गायब हो गया।
महत्वपूर्ण बात यह है कि जिस समय यह पूरा घटनाक्रम हुआ, उस समय राज्यपाल के निर्देश पर शिक्षकों के प्रमोशन को लेकर एक अहम बैठक चल रही थी।
इस घटना के बाद कई सवाल उठ रहे हैं। महिला आयोग की उपाध्यक्ष की मौजूदगी में विश्वविद्यालय परिसर में इस तरह की अराजकता कैसे फैल गई? क्या आयोग के पदाधिकारियों की जिम्मेदारी नहीं थी कि वे भीड़ को नियंत्रित करें? प्रमोशन बैठक के दौरान अचानक हुए इस हमले का उद्देश्य क्या था?
महिला आयोग का गठन महिलाओं की सुरक्षा और अधिकारों की रक्षा के लिए किया गया है, लेकिन इस घटना ने आयोग की भूमिका और साख पर सवाल खड़े कर दिए हैं। पुलिस तहरीर में दर्ज अज्ञात भीड़ की पहचान और जिम्मेदारी तय करने में प्रशासन कितनी गंभीरता दिखाएगा, यह भी देखने वाली बात होगी।
साथ ही यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या इस पूरे घटनाक्रम के पीछे कोई राजनीतिक या व्यक्तिगत हित जुड़े हुए हैं। फिलहाल, केजीएमयू में हुई इस घटना ने न सिर्फ विश्वविद्यालय की सुरक्षा व्यवस्था बल्कि महिला आयोग जैसी संवैधानिक संस्था की कार्यशैली पर भी गंभीर बहस छेड़ दी है।

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