शब्दों का कारवाँ _

परिवेश , 594

आंख में ज्वाला और सीने में त्रिशूल रखते हैं;

हम भी अपनी ज़िंदगी के कुछ उसूल रखते हैं

 

हम वह हैं जो खुद को दिखाते हैं रास्ता; 

बेकार की बातों के लिए लफ्ज़ फिजूल रखते हैं

 

जो करते हैं दिल से मोहब्बत हमसे;

अपने आपको हम उनमें मशगूल रखते हैं

 

हम नहीं कहते बड़े - बड़े शायर कहते हैं;

अल्फ़ाज़ आपके दिल में एक रसूल रखते हैं

 

हमारा भी दिल है कोई पत्थर नहीं;

हम भी चाहने वालों की तस्वीर वसूल रखते हैं।

 

शिवांगी जैन

युवा लेखिका/साहित्यकार

लखनऊ, उत्तरप्रदेश

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