*आजादी के बाद भारतीय राजनीति की 7 निर्णायक जुगलबंदियां: जिन्होंने देश की दिशा बदली*

परिवेश , 27

आजादी के बाद भारत का नक्शा, अर्थव्यवस्था और समाज कुछ खास राजनीतिक साझेदारियों से गढ़ा गया। इन सात जुगलबंदियों ने निर्णायक असर डाला।

*1. नेहरू-पटेल:* नेहरू के लोकतांत्रिक-समाजवादी विजन और पटेल की लौह प्रशासनिक क्षमता ने भारत को एक राष्ट्र बनाया। पटेल ने 562 रियासतों का विलय कर भौगोलिक एकता दी, जबकि नेहरू ने योजना आयोग, IIT, बांध जैसे आधुनिक भारत की बुनियाद रखी। मतभेदों के बावजूद दोनों ने लोकतंत्र को संस्थागत किया।

*2. इंदिरा-पीएन हक्सर:* 1969 के बैंक राष्ट्रीयकरण, प्रिवी पर्स खत्म करने और 1971 के बांग्लादेश युद्ध जैसे कड़े फैसलों के पीछे हक्सर की रणनीति थी। इस जोड़ी ने समाजवादी अर्थनीति और कूटनीति में भारत को आक्रामक पहचान दी।

*3. इंदिरा-संजय:* 1975-77 का आपातकाल और 20-सूत्री कार्यक्रम संजय की छाया में चला। नसबंदी, स्लम हटाओ जैसे अभियानों ने सामाजिक ढांचे को झकझोरा। सत्ता का केंद्रीकरण चरम पर पहुंचा, जिसने लोकतंत्र की परीक्षा ली।

*4. राव-मनमोहन:* 1991 का आर्थिक संकट राव के राजनीतिक साहस और मनमोहन की अर्थशास्त्री दृष्टि से टला। LPG सुधारों, लाइसेंस राज खत्म करने से भारत वैश्विक अर्थव्यवस्था से जुड़ा। आर्थिक नक्शा पूरी तरह बदल गया।

*5. वाजपेयी-आडवाणी:* वाजपेयी के उदार चेहरे और आडवाणी के सांगठनिक कौशल ने भाजपा को सत्ता तक पहुंचाया। पोखरण परमाणु परीक्षण, स्वर्णिम चतुर्भुज योजना और गठबंधन धर्म की राजनीति ने भौगोलिक व आर्थिक मजबूती दी।

*6. मनमोहन-सोनिया:* UPA का दोहरा पावर सेंटर। मनमोहन की आर्थिक समझ से विकास दर 8% पार गई, वहीं सोनिया के नेतृत्व में मनरेगा, RTI, खाद्य सुरक्षा जैसे अधिकार-आधारित सामाजिक कानून आए।

*7. मोदी-शाह:* अनुच्छेद 370 हटाना, GST लागू करना, UPI-डिजिटल इकोनॉमी से भौगोलिक-आर्थिक एकीकरण हुआ। शाह की चुनावी रणनीति और मोदी की नीतिगत पहल ने केंद्र-राज्य संबंधों और सामाजिक विमर्श को नया मोड़ दिया।

ये जुगलबंदियां बताती हैं कि भारत की राजनीति सिर्फ व्यक्तियों से नहीं, बल्कि साझा विजन और कार्यशैली से चलती है।

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