*छठ पूजा पर विशेष* ==============

जनपत की खबर , 686

लखनऊ।
कार्तिक मास की अमावस्या को दीवाली मनाने के तुरंत बाद मनाए जाने वाले इस चार दिवसिए व्रत की सबसे कठिन और महत्वपूर्ण रात्रि कार्तिक शुक्ल षष्ठी की होती है इसी कारण इस व्रत का नाम करण छठ व्रत हो गया छठ पर्व षष्ठी तिथि का अपभ्रंश है।

सूर्य षष्ठी व्रत होने के कारण इसे छठ कहा गया है इस पर्व को वर्ष में दो बार मनाया जाता है पहली बार चैत्र में और दूसरी बार कार्तिक में चैत्र शुक्ल पक्ष षष्ठी पर मनाए जाने वाले छठ पर्व को चैती छठ व कार्तिक शुक्ल पक्ष षष्ठी पर मनाए जाने वाले पर्व को कार्तिकी छठ कहा जाता है पारिवारिक सुख-स्मृद्धि तथा मनोवांछित फल प्राप्ति के लिए यह पर्व मनाया जाता है। 

*छठ पर्व में सूर्य और छठी मैया की पूजा* 
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छठ पूजा में सूर्य देव की पूजा की जाती है और उन्हें अर्घ्य दिया जाता है सूर्य प्रत्यक्ष रूप में दिखाई देने वाले देवता है, जो पृथ्वी पर सभी प्राणियों के जीवन का आधार हैं सूर्य देव के साथ-साथ छठ पर छठी मैया की पूजा का भी विधान है। 

सूर्य और छठी मैया का संबंध भाई बहन का है मूलप्रकृति के छठे अंश से प्रकट होने के कारण इनका नाम षष्ठी पड़ा वह कार्तिकेय की पत्नी भी हैं षष्ठी देवी देवताओं की देवसेना भी कही जाती हैं पौराणिक कथाओं के अनुसार षष्ठी की पहली पूजा सूर्य ने की थी

वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो षष्ठी के दिन विशेष खगोलिय परिवर्तन होता है तब सूर्य की पराबैगनी किरणें असामान्य रूप से एकत्र होती हैं और इनके कुप्रभावों से बचने के लिए सूर्य की ऊषा और प्रत्यूषा के रहते जल में खड़े रहकर छठ व्रत किया जाता है

पौराणिक मान्यता के अनुसार छठी मैया या षष्ठी माता संतानों की रक्षा करती हैं और उन्हें दीर्घायु प्रदान करती हैं।

शास्त्रों में षष्ठी देवी को ब्रह्मा जी की मानस पुत्री भी कहा गया है पुराणों में इन्हें माँ कात्यायनी भी कहा गया है, जिनकी पूजा नवरात्रि में षष्ठी तिथि पर होती है षष्ठी देवी को ही बिहार-झारखंड में स्थानीय भाषा में छठ मैया कहा गया है।

*छठ पर्व परंपरा*
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यह पर्व चार दिनों तक चलता है भैया दूज के तीसरे दिन से यह आरंभ होता है पहले दिन सैंधा नमक, घी से बना हुआ अरवा चावल और कद्दू की सब्जी प्रसाद के रूप में ली जाती है अगले दिन से उपवास आरंभ होता है इस दिन रात में खीर बनती है व्रतधारी रात में यह प्रसाद लेते हैं तीसरे दिन डूबते हुए सूर्य को अर्घ्य यानी दूध अर्पण करते हैं अंतिम दिन उगते हुए सूर्य को अर्घ्य चढ़ाते हैं इस पूजा में पवित्रता का ध्यान रखा जाता है लहसून, प्याज वर्ज्य है जिन घरों में यह पूजा होती है, वहां भक्तिगीत गाए जाते हैं आजकल कुछ नई रीतियां भी आरंभ हो गई हैं, जैसे पंडाल और सूर्य देवता की मूर्ति की स्थापना करना उसपर भी रोषनाई पर काफी खर्च होता है और सुबह के अर्घ्य के उपरांत आयोजनकर्ता माईक पर चिल्लाकर प्रसाद मांगते हैं पटाखे भी जलाए जाते हैं कहीं-कहीं पर तो ऑर्केस्ट्रा का भी आयोजन होता है परंतु साथ ही साथ दूध, फल, उदबत्ती भी बांटी जाती है पूजा की तैयारी के लिए लोग मिलकर पूरे रास्ते की सफाई करते हैं।

*छठ व्रत*

छठ उत्सव के केंद्र में छठ व्रत है जो एक कठिन तपस्या की तरह है यह प्रायः महिलाओं द्वारा किया जाता है किंतु कुछ पुरुष भी यह व्रत रखते हैं व्रत रखने वाली महिला को परवैतिन भी कहा जाता है चार दिनों के इस व्रत में व्रती को लगातार उपवास करना होता है भोजन के साथ ही सुखद शैय्या का भी त्याग किया जाता है पर्व के लिए बनाए गए कमरे में व्रती फर्श पर एक कंबल या चादर के सहारे ही रात बिताई जाती है इस उत्सव में शामिल होने वाले लोग नए कपड़े पहनते हैं पर व्रती ऐसे कपड़े पहनते हैं, जिनमें किसी प्रकार की सिलाई नहीं की होती है महिलाएं साड़ी और पुरुष धोती पहनकर छठ करते हैं ‘शुरू करने के बाद छठ पर्व को सालोंसाल तब तक करना होता है, जब तक कि अगली पीढ़ी की किसी विवाहित महिला को इसके लिए तैयार न कर लिया जाए घर में किसी की मृत्यु हो जाने पर यह पर्व नहीं मनाया जाता है।’

ऐसी मान्यता है कि छठ पर्व पर व्रत करने वाली महिलाओं को पुत्र रत्न की प्राप्ति होती है पुत्र की चाहत रखने वाली और पुत्र की कुशलता के लिए सामान्य तौर पर महिलाएं यह व्रत रखती हैं किंतु पुरुष भी यह व्रत पूरी निष्ठा से रखते हैं।

*छठ पूजा विधि*
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छठ पूजा से पहले निम्न सामग्री जुटा लें और फिर सूर्य देव को विधि विधान से अर्घ्य दें।

बांस की ०३ बड़ी टोकरी, बांस या पीतल के बने ०३ सूप, थाली, दूध और ग्लास।

चावल, लाल सिंदूर, दीपक, नारियल, हल्दी, गन्ना, सुथनी, सब्जी और शकरकंदी।

नाशपती, बड़ा नींबू, शहद, पान, साबुत सुपारी, कैराव, कपूर, चंदन और मिठाई।

प्रसाद के रूप में ठेकुआ, मालपुआ, खीर-पुड़ी, सूजी का हलवा, चावल के बने लड्डू लें।

*सूर्य को अर्घ्य देने की विधि-* बांस की टोकरी में उपरोक्त सामग्री रखें सूर्य को अर्घ्य देते समय सारा प्रसाद सूप में रखें और सूप में ही दीपक जलाएँ फिर नदी में उतरकर सूर्य देव को अर्घ्य दें।


'केलवा जे फरेला घवद से, 
ओह पर सुगा मे़ड़राय
काँच ही बाँस के बहंगिया, 
बहंगी लचकत जाए'
सेविले चरन तोहार 
हे छठी मइया। 
महिमा तोहर अपार।
उगु न सुरुज देव 
भइलो अरग के बेर।
निंदिया के मातल 
सुरुज अँखियो न खोले हे।
चार कोना के पोखरवा
हम करेली छठ 
बरतिया से उनखे लागी।

इस गीत में एक ऐसे ही तोते का जिक्र है जो केले के ऐसे ही एक गुच्छे के पास मंडरा रहा है तोते को डराया जाता है कि अगर तुम इस पर चोंच मारोगे तो तुम्हारी शिकायत भगवान सूर्य से कर दी जाएगी जो तुम्हें माफ नही करेंगे पर फिर भी तोता केले को जूठा कर देता है और सूर्य के कोप का भागी बनता है पर उसकी भार्या सुगनी अब क्या करे बेचारी कैसे सहे इस वियोग को  अब तो ना देव या सूर्य कोई उसकी सहायता नहीं कर सकते आखिर पूजा की पवित्रता जो नष्ट की है उसने।

केरवा जे फरेला घवद से 
ओह पर सुगा मेड़राय।

उ जे खबरी जनइबो अदिक 
(सूरज) से सुगा देले जुठियाए।

उ जे मरबो रे सुगवा 
धनुक से सुगा गिरे मुरझाय।

उ जे सुगनी जे रोए 
ले वियोग से आदित 
होइ ना सहाय 
देव होइ ना सहाय।

काँच ही बाँस के बहँगिया, बहँगी लचकति जाय... बहँगी लचकति जाय... बात जे पुछेलें बटोहिया बहँगी केकरा के जाय  बहँगी केकरा के जाय  तू त आन्हर हउवे रे बटोहिया, बहँगी छठी माई के जाय... बहँगी छठी माई के जाय... काँच ही बाँस के बहँगिया, बहँगी लचकति जाय... बहँगी लचकति जाय... केरवा जे फरेला घवध से ओह पर सुगा मेंड़राय... ओह पर सुगा मेंड़राय... खबरि जनइबो अदित से सुगा देलें जूठियाय सुगा देलें जूठियाय... ऊ जे मरबो रे सुगवा धनुष से सुगा गिरे मुरझाय... सुगा गिरे मुरझाय... केरवा जे फरेला घवध से ओह पर सुगा मेंड़राय... ओह पर सुगा मेंड़राय... पटना के घाट पर नरियर नरियर किनबे जरूर... नरियर किनबो जरूर... हाजीपुर से केरवा मँगाई के अरघ देबे जरूर... अरघ देबे जरुर... आदित मनायेब छठ परबिया बर मँगबे जरूर... बर मँगबे जरूर... पटना के घाट पर नरियर नरियर किनबे जरूर... नरियर किनबो जरूर... पाँच पुतर अन धन लछमी, लछमी मँगबे जरूर... लछमी मँगबे जरूर... पान सुपारी कचवनिया छठ पूजबे जरूर... छठ पूजबे जरूर... हियरा के करबो रे कंचन वर मँगबे जरूर... वर मँगबे जरूर... पाँच पुतर अन धन लछमी, लछमी मँगबे जरूर... लछमी मँगबे जरूर... पुआ पकवान कचवनिया सूपवा भरबे जरूर... सूपवा भरबे जरूर... फर फूल भरबे दउरिया सेनूरा टिकबे जरूर... सेनूरा टिकबे जरुर... उहवें जे बाड़ी छठि मईया आदित रिझबे जरूर... आदित रिझबे जरूर... काँच ही बाँस के बहँगिया, बहँगी लचकति जाय... बहँगी लचकति जाय... बात जे पुछेलें बटोहिया बहँगी केकरा के जाय  बहँगी केकरा के जाय  तू त आन्हर हउवे रे बटोहिया, बहँगी छठी माई के जाय... बहँगी छठी माई के जाय..

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