लखनऊ में पत्रकार पर हमले को चार दिन, पुलिस अभी भी सुस्त—भड़के पत्रकारों ने किया CM आवास की ओर मार्च

राष्ट्रीय , 114

लखनऊ। राजधानी लखनऊ में पत्रकार सुशील अवस्थी पर हुए जानलेवा हमले को चार दिन बीत चुके हैं, लेकिन पुलिसिया कार्रवाई अब भी रफ्तार पकड़ने को तैयार नहीं दिख रही। अपराधी बेखौफ घूम रहे हैं और प्रशासन की चुप्पी जनता ही नहीं, पत्रकार समुदाय को भी गहरे सवालों में डाल रही है। पत्रकार पर हमला हुआ, पर शर्म और जिम्मेदारी जैसे अभी तक शासन-प्रशासन के दरवाज़े तक नहीं पहुँची। न्याय गायब है, पुलिस बहानों की तलाश में उलझी है और अधिकारी मौनव्रत में डूबे बैठे हैं। सत्ता की छाया में एक बार फिर सच को घायल कर दिया गया है—और शहर पूछ रहा है, आखिर सिस्टम कब जागेगा?

इसी लापरवाही के विरोध में आज राजधानी के सैकड़ों पत्रकार सड़कों पर उतर आए। हज़रतगंज स्थित गांधी प्रतिमा पर धरना-प्रदर्शन शुरू हुआ तो उम्मीद थी कि वरिष्ठ अफसर हरकत में आएंगे, लेकिन स्थितियाँ उलट रहीं—गांधी प्रतिमा पर भीड़ जागी, लोकतंत्र का चौथा स्तंभ उबल पड़ा, पर अधिकारी पहुंचना जरूरी नहीं समझ पाए। पुलिस अफसरों की गैरमौजूदगी ने पत्रकारों के गुस्से को और भड़का दिया। देखते ही देखते विरोध जताने वालों का कारवां मुख्यमंत्री आवास की ओर बढ़ने लगा।

पुलिस ने रास्ते में रोकने और समझाने की कोशिश की, मगर पत्रकारों का एक ही सवाल था—हमलावर कहाँ हैं? इस सवाल का जवाब किसी के पास नहीं था, और यही खामोशी प्रदर्शनकारियों को आगे बढ़ाती रही।

आखिरकार राजभवन कॉलोनी चौराहे पर पुलिस ने बैरिकेडिंग लगाकर मार्च को रोक दिया। यहां भी नारों और विरोध का सिलसिला थमा नहीं। सड़क पर ही प्रदर्शन जारी रहा। अंततः वरिष्ठ पुलिस अधिकारी पंकज दीक्षित मौके पर पहुंचे और हमलावरों की जल्द गिरफ्तारी व गंभीर धाराओं में कार्रवाई का आश्वासन दिया।

आश्वासन के बाद पत्रकारों ने प्रदर्शन समाप्त तो कर दिया, लेकिन साथ ही साफ चेतावनी दे डाली—अगर अपराधी जल्द सलाखों के पीछे नहीं पहुँचे, तो अगला विरोध सिर्फ लखनऊ में नहीं बल्कि पूरे प्रदेश में होगा। और इस बार न बैरिकेडिंग काम आएगी, न बहाने।

दोपहर 12 से 3 बजे तक चले इस जोरदार प्रदर्शन ने एक सख्त संदेश दिया—पत्रकार पर हमला किसी एक व्यक्ति पर वार नहीं, यह लोकतंत्र की रीढ़ पर सीधी चोट है।
अब पत्रकारों की निगाहें यूपी पुलिस की कार्रवाई पर टिकी हैं—क्या पुलिस इस चोट की गूंज सुनेगी या फिर अपराधियों के साथ-साथ सिस्टम भी गायब ही रहेगा?

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