सच्चे ज्ञान में भगवान और सच्चे भगवान से मोक्ष की प्राप्ति -- महात्मा शिवानंद दास
अन्य खबरे Apr 06, 2025 at 07:03 PM , 215साड़ीमहानगा/लखीमपुर। सदानन्द तत्त्वज्ञान परिषद् के तत्वावधान में साड़ी , महनगा, सिद्धार्थनगर स्थित भगवद धाम आश्रम में श्रीरामनवमी के अवसर पर सत्संग सुनाते हुए सन्त ज्ञानेश्वर स्वामी सदानन्द जी परमहंस से तत्त्वज्ञान प्राप्त महात्मा शिवानन्द दास ने कहा आज समाज में स्वार्थी और कपटी कालनेमी जैसे भी गुरु और सदगुरु बनकर जन समाज को अपने झूठे ज्ञान से दिग्भ्रमित कर रहे हैं, ऐसे झूठे गुरुओं के जाल से बचने के लिए जनसमाज को स्वयं ही सावधान होना रहना पड़ेगा, क्योंकि आध-अधूरे और झूठे ज्ञान से मनुष्य जीवन का मंजिल मुक्ति और अमरता का साक्षात् बोध कदापि सम्भव नहीं है, मानव जीवन का परमलक्ष्य इससे प्राप्त नहीं हो सकता। आध-अधूरे ज्ञानोपदेश में ‘नीम हकीम खतरे जान’ वाली युक्ति लागू होती है । यह मानवीय शरीर (पिण्ड) इस सृष्टि की सर्वोंत्तम मशीन है जो परमात्मा-परमेश्वर-खुदा-गॉड-भगवान ने हम लोगों को अहैतुकी कृपा कर अपने ही निजरूप को प्रदान किया है । सच्चे तत्त्ववेत्ता सद्गुरु से प्राप्त ‘तत्त्वज्ञान रूप भगवद्ज्ञान रूप सत्यज्ञान’ के अन्तर्गत कोई भी जिज्ञासु भक्त ‘सम्पूर्ण’ (संसार-शरीर-जीव-ईश्वर-परमेश्वर) को सम्पूर्णतया (शिक्षा-स्वाध्याय-योग साधना या अध्यात्म और तत्त्वज्ञान से) जानते हुये देख सकता है । जैसे भगवान श्रीराम ने अपने शिष्यों कागभुशुण्डि, सेवरी, हनुमान, लक्ष्मण को दिखाया । सच्चा सद्गुरु अपने शिष्यों को वेद का तीनों सूत्र का सैद्धान्तिक और प्रायौगिक ज्ञान देकर अपनी अस्तित्त्व, मार्ग और मंजिल तीनों का स्पष्टतः बोध कराते हैं जैसे -
पहला सूत्र ‘असदोमासद्गमय’ (असत्य नहीं, सत्य की ओर चलें !)-
दूसरा सूत्र ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ (मोह-अन्धकार नहीं, दिव्य ज्योति की ओर चलें !)
तीसरा सूत्र ‘मृत्योर्माऽमृतं गमय’ (मृत्यु नहीं, अमरता के ओर चलें ! ) - सच्चे गुरु की पहचान सच्चे ज्ञान (तत्त्वज्ञान) के आधार पर होती है और सच्चा ज्ञान वह है जिसमें झाँकने पर चार अक्षर वाला विराट पुरुष रूप भगवान सामने ही दिखाई देता हो । भगवान् के सच्चे होने को तब स्वीकारें, जब उसमें सम्पूर्ण को सम्पूर्णतया (सारी सृष्टि जिसमें ब्रम्हा, इन्द्र और शंकर आदि-आदि भी सम्मिलित हैं, की उत्पत्ति, स्थिति व लय-विलय भी ) साक्षात् देखते हुये आमने-सामने ही बात-चीत सहित उनका परिचय-पहचान प्राप्त होता हो तथा उनमें मुक्ति और अमरता का साक्षात् बोध भी मिले। यदि ऐसा नहीं तो वह सच्चा भगवान नहीं और जब वह सच्चा भगवान नहीं तो वह ज्ञान सच नहीं और जब वह ज्ञान ही सच नहीं तो वह ज्ञानदाता गुरु भला कैसे सच हो सकता है ! सच्चे गुरु से सच्चा ज्ञान और सच्चे ज्ञान में सच्चा भगवान तथा सच्चे भगवान् से मुक्ति-अमरता का साक्षात् बोध तत्क्षण प्राप्त होता है । सच्चे भगवान वाले ज्ञान को ही तत्त्वज्ञान कहते हैं और तत्त्वज्ञानदाता को ही सद्गुरु साकार भगवान कहते हैं।



























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