स्वतंत्र भारत की मुफलिसी के साथी सी.एम.त्रिपाठी भी गए

जनपत की खबर , 398

लखनऊ।

लखनऊ से प्रकशित अपने जम़ाने के चर्चित अख़बार स्वतंत्र भारत में निरंतर पच्चीस बरस सेवाएं देने वाले डेस्क के दिग्गज पत्रकार सी.एम.त्रिपाठी भी सिधार गए। वो क़रीब साल भर से बीमार चल रहे थे।
स्वतंत्र भारत के परिशिष्ट उपहार और चर्चित व्यंग्य कॉलम कांव-कांव की विरासत को उन्होंने बखूबी संभाला था। 
सी.एम.भाई मेरे पुराने साथी थे।  स्वतंत्र भारत में संकट के दिन शुरू हो गए थे, पुराने लोग छोड़-छोड़ के जा रहे थे। नब्बे के दशक के सरपरस्त प्रमोद-जोशी-नवीन जोशी भी विदा ले चुके थे। गुरुदेव नारायण और ताहिर अब्बास जैसे तमाम दिग्गज पहले ही कुबेर टाइम्स जा चुके थे। बचे खुचे लोग हड़ताड़ पर उतारू हो गए थे। वेतन ना मिलने के विरोध में  मैनेजमेंट के खिलाफ अखबारकर्मी धरने पर बैठ गए थे। बात इतनी बढ़ गई थी कि तत्कालीन जिलाधिकारी को अखबार के मालिक/मैनेजमेंट और हड़ताड़ी अखबार कर्मियों के बीच मध्यस्थता के लिए सामने आना पड़ा था।
 स्वतंत्र भारत को छापने के लिए नई भर्तियां कर अखबार का मैनेजमेंट जैसे तैसे अखबार छपवाने की कोशिश कर रहा था। 
ऐसे कठिन समय में सी.एम. त्रिपाठी ने स्वतंत्र भारत ज्वाइन किया था। हड़ताड़ के बावजूद भी चुनौतियों के साथ अखबार छापने में मुख्य भूमिका निभाने वाले वरिष्ठ पत्रकार रजनीकांत वशिष्ट शायद उनको लाए थे। एडीटोरियल की सभी विधाओं के मास्टर त्रिपाठी जी ज्वाइन करते ही अखबार छपने की चुनौती के संघर्ष मे लग गए थे। वो डीटीपी से खबरों के मैटर का प्रिंट आउट भाग-भाग कर पेस्टिंग रूम पंहुचा रहे थे तब वशिष्ट जी ने मुझसे उनका परिचय कराया था। और कहा था कि तुम्हारे लिए एक साहित्यिक साथी ले आया हूं। 
ये बात हो रही है 1998 की। 
ये वो वक्त था जब स्वतंत्र भारत ढलान पर था। इससे पहले नवीन जोशी जी और विनोद श्रीवास्तव जी की जोड़ी ने स्वतंत्र भारत की आत्मा कहे जाने वाले परिशिष्ट 'उपहार' को विशिष्ट पहचान दिलाई थी। सी एम त्रिपाठी जी ने हड़ताड़ी माहौल, सैलरी के संकट और कम संसाधनों के साथ एक-दो ट्रेनी लड़कियों के साथ उपहार की गुणवत्ता को बरक़रार रखने की हर मुम्किन कोशिश की। 
मुफलिसी में भी वो स्वतंत्र भारत का लम्बे समय तक साथ देते रहे।पूरी स्वतंत्रता से काम करते रहे। वो सम्पादकीय पेज भी देखते थे और बतौर साहित्यिक संपादक उपहार परिशिष्ट भी संभालते थे। ये वो परिशिष्ट था जिसके जरिए घनश्याम पंकज और नवीन जोशी जैसै दिग्गजों ने अपनी कल्पना को साकार कर अखबारी दुनिया को एक नया आयाम दिया था। अखबारी पाठक को स्वास्थ्यवर्धक और ज्ञानवर्धक साहित्यिक मसाले का जायक़ा देने की शुरूआत की थी। 
 लेकिन दुर्भाग्य कि गुजरते वक्त के साथ देश की आजादी के साक्षी स्वतंत्र भारत का सारा ग्लेमर फीका पड़ गया। ऐसे में खाटी पत्रकार और कवि सी.एम. त्रिपाठी मुफलिसी मे भी इस अखबार का साथ देते रहे। 
- नवेद शिकोह
9918223245

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