**कागज़ों में 'सरप्लस' शिक्षक, स्कूलों में शिक्षा का संकट: क्या छात्र संख्या का गणित बच्चों का भविष्य तय करेगा?**
राष्ट्रीय Jul 19, 2026 at 06:46 AM , 99**30 हजार से अधिक शिक्षकों को सरप्लस घोषित करने की प्रक्रिया पर उठ रहे सवाल—क्या केवल छात्र संख्या के आधार पर शिक्षक तय करना शिक्षा व्यवस्था को कमजोर कर रहा है?**
उत्तर प्रदेश के परिषदीय विद्यालयों में 30 हजार से अधिक शिक्षकों को 'सरप्लस' घोषित किए जाने की प्रक्रिया ने शिक्षा व्यवस्था की वास्तविक स्थिति पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार लगभग 19 हजार शिक्षक प्राथमिक विद्यालयों तथा करीब 11 हजार शिक्षक उच्च प्राथमिक विद्यालयों में आवश्यकता से अधिक बताए जा रहे हैं। लेकिन जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल अलग तस्वीर पेश करती है।
सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि यदि हजारों शिक्षक वास्तव में सरप्लस हैं, तो प्रदेश के अनेक विद्यालय आज भी एकल शिक्षक व्यवस्था पर क्यों चल रहे हैं? आखिर वे कौन-से विद्यालय हैं जहां शिक्षक अधिक हैं और वे कौन-से विद्यालय हैं जहां बच्चों को पढ़ाने वाला पर्याप्त स्टाफ उपलब्ध नहीं है?
दरअसल, समस्या शिक्षकों की संख्या से अधिक उन मानकों की है जिनके आधार पर शिक्षक आवश्यकता तय की जा रही है। वर्तमान व्यवस्था में 30 विद्यार्थियों पर एक शिक्षक, 60 पर दो और 90 विद्यार्थियों पर तीन शिक्षक पर्याप्त माने जा रहे हैं। यह गणित कागजों पर भले संतुलित दिखाई देता हो, लेकिन शिक्षा की वास्तविक जरूरतों से इसका मेल नहीं बैठता।
प्राथमिक विद्यालयों में कक्षा 1 से 5 तक के विद्यार्थी अध्ययन करते हैं। प्रत्येक कक्षा का पाठ्यक्रम, सीखने का स्तर और शिक्षण पद्धति अलग होती है। कक्षा एक के बच्चों को अक्षर ज्ञान की आवश्यकता होती है, तो कक्षा पांच के विद्यार्थी विज्ञान, गणित और अंग्रेजी जैसे विषयों की जटिल अवधारणाएं सीख रहे होते हैं। ऐसे में यदि पूरे विद्यालय में केवल एक या दो शिक्षक हों, तो उनसे सभी कक्षाओं को समान गुणवत्ता के साथ पढ़ाने की अपेक्षा करना व्यावहारिक नहीं कहा जा सकता।
स्थिति उच्च प्राथमिक विद्यालयों में भी कम चुनौतीपूर्ण नहीं है। कक्षा 6, 7 और 8 में हिंदी, अंग्रेजी, गणित, विज्ञान तथा सामाजिक विज्ञान जैसे विषय पढ़ाए जाते हैं। इन विषयों के लिए विषय विशेषज्ञ शिक्षकों की आवश्यकता होती है। यदि सीमित संख्या में शिक्षक उपलब्ध होंगे, तो गुणवत्तापूर्ण विषय शिक्षण प्रभावित होना स्वाभाविक है।
वास्तविकता यह भी है कि सरकारी शिक्षक केवल शिक्षण कार्य तक सीमित नहीं हैं। जनगणना, चुनाव, विभिन्न सर्वेक्षण, आधार सत्यापन, डीबीटी, छात्रवृत्ति, पोर्टल पर ऑनलाइन फीडिंग, विभागीय प्रशिक्षण, बैठकों और अनेक प्रशासनिक कार्यों में उनकी नियमित भागीदारी रहती है। ऐसे में यदि किसी विद्यालय में पहले से ही सीमित शिक्षक हों और उनमें से भी किसी को गैर-शैक्षणिक कार्यों में भेज दिया जाए, तो विद्यालय में पढ़ाई लगभग ठप हो जाती है।
यही कारण है कि कई अभिभावक सरकारी विद्यालयों की बजाय निजी विद्यालयों का रुख करते हैं। निजी विद्यालयों में प्रत्येक कक्षा के लिए अलग शिक्षक, विषयवार शिक्षण व्यवस्था, कार्यालयी स्टाफ तथा गैर-शैक्षणिक कार्यों के लिए अलग कर्मचारी उपलब्ध रहते हैं। इसके विपरीत सरकारी विद्यालयों में एक शिक्षक को कई कक्षाएं संभालने के साथ-साथ प्रशासनिक दायित्व भी निभाने पड़ते हैं। इसके बावजूद दोनों व्यवस्थाओं के परिणामों की तुलना की जाती है, जो स्वाभाविक रूप से संतुलित नहीं कही जा सकती।
शिक्षा विशेषज्ञों का भी मानना है कि शिक्षा केवल छात्र संख्या का गणित नहीं है। प्रत्येक कक्षा को नियमित शिक्षक, प्रत्येक विषय को पर्याप्त समय और प्रत्येक बच्चे को व्यक्तिगत शैक्षणिक सहयोग की आवश्यकता होती है। यदि शिक्षक उपलब्धता का निर्धारण केवल नामांकित विद्यार्थियों की संख्या के आधार पर होगा, तो शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित होना तय है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि शिक्षक तैनाती के मानकों की व्यापक समीक्षा की जाए। प्राथमिक विद्यालयों में कम से कम प्रत्येक कक्षा के लिए एक शिक्षक सुनिश्चित किया जाए, जबकि उच्च प्राथमिक विद्यालयों में विषयवार पर्याप्त शिक्षकों की व्यवस्था हो। साथ ही शिक्षकों को गैर-शैक्षणिक कार्यों से यथासंभव मुक्त कर उनका अधिकतम समय शिक्षण कार्य के लिए उपलब्ध कराया जाए।
सरकारी विद्यालयों की गुणवत्ता सुधारने के लिए केवल आंकड़ों में संतुलन दिखाना पर्याप्त नहीं होगा। शिक्षा व्यवस्था की सफलता इस बात से तय होगी कि कक्षा में बच्चों को कितना प्रभावी शिक्षण मिल रहा है, न कि इस आधार पर कि कागजों में कितने शिक्षक 'सरप्लस' दिखाई दे रहे हैं।
**यदि शिक्षा को वास्तव में मजबूत बनाना है, तो शिक्षक को संख्या नहीं, संसाधन मानना होगा। अन्यथा कागजों में शिक्षक सरप्लस घोषित होते रहेंगे और विद्यालयों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा लगातार घाटे का सौदा बनती जाएगी।**






























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