सरकारी सूचना पर चयनात्मक पहरा? एमवीवीएनएल की पहली प्रेस वार्ता ने खड़े किए पारदर्शिता और निष्पक्षता पर गंभीर सवाल

राष्ट्रीय , 62

लखनऊ। मध्यांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड (एमवीवीएनएल) के नवागत प्रबंध निदेशक की पहली प्रेस वार्ता शुरू होने से पहले ही विवादों के केंद्र में आ गई है। आरोप है कि विभाग की ओर से आयोजित इस महत्वपूर्ण प्रेस वार्ता में केवल चुनिंदा पत्रकारों और मीडिया संस्थानों को आमंत्रित किया गया, जबकि लंबे समय से विद्युत विभाग की गतिविधियों को कवर करने वाले अनेक मान्यता प्राप्त पत्रकारों एवं प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों को न तो आमंत्रण भेजा गया और न ही कार्यक्रम की कोई आधिकारिक सूचना उपलब्ध कराई गई।

यह मामला केवल एक प्रेस वार्ता तक सीमित नहीं है, बल्कि सरकारी सूचना प्रणाली की पारदर्शिता, निष्पक्षता और समान अवसर के सिद्धांतों पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकारी विभागों द्वारा आयोजित प्रेस वार्ताओं का उद्देश्य सभी मीडिया संस्थानों तक समान रूप से सूचनाएं पहुंचाना होता है, ताकि आम जनता तक तथ्यात्मक और संतुलित जानकारी पहुंच सके। यदि सूचना का प्रवाह चुनिंदा लोगों तक सीमित कर दिया जाए, तो यह व्यवस्था की निष्पक्षता पर स्वाभाविक रूप से संदेह उत्पन्न करता है।

सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या किसी सरकारी विभाग का जनसंपर्क अधिकारी (PRO) कार्यालय यह तय करेगा कि कौन पत्रकार है और किसे सरकारी कार्यक्रम में शामिल होने का अधिकार मिलेगा? यदि पत्रकारों का चयन व्यक्तिगत पसंद, निकटता या अन्य गैर-पारदर्शी आधारों पर किया जाता है, तो यह न केवल पत्रकारिता की स्वतंत्रता के मूल सिद्धांतों के विपरीत है, बल्कि सरकारी जनसंपर्क व्यवस्था की विश्वसनीयता को भी प्रभावित करता है।

पत्रकारों का कहना है कि मान्यता प्राप्त सभी मीडिया संस्थानों के साथ समान व्यवहार किया जाना चाहिए। सरकारी सूचनाओं पर किसी एक वर्ग या सीमित समूह का अधिकार नहीं हो सकता। लोकतंत्र में सूचना का समान अधिकार ही जवाबदेही और पारदर्शिता की सबसे मजबूत नींव है।

उठ रहे हैं कई महत्वपूर्ण सवाल

  • क्या प्रेस वार्ता का निमंत्रण सभी मान्यता प्राप्त मीडिया संस्थानों को भेजा गया था?
  • यदि नहीं, तो पत्रकारों और मीडिया संस्थानों के चयन का आधार क्या था?
  • आमंत्रण सूची किसके निर्देश पर तैयार की गई?
  • क्या भविष्य में भी सरकारी कार्यक्रमों में केवल चुनिंदा पत्रकारों को ही प्राथमिकता दी जाएगी?
  • क्या एमवीवीएनएल की जनसंपर्क व्यवस्था पारदर्शिता के बजाय पसंद-नापसंद की संस्कृति पर आधारित होती जा रही है?

इन सवालों का उत्तर केवल पत्रकार ही नहीं, बल्कि आम नागरिक भी जानना चाहते हैं, क्योंकि सरकारी विभाग जनता के संसाधनों से संचालित होते हैं और उनकी सूचना व्यवस्था भी समानता एवं पारदर्शिता के सिद्धांतों पर आधारित होनी चाहिए।

सूत्रों के अनुसार, इस पूरे प्रकरण को लेकर पत्रकारों का एक प्रतिनिधिमंडल शीघ्र ही एमवीवीएनएल के नवागत प्रबंध निदेशक से मुलाकात करेगा और जनसंपर्क व्यवस्था में कथित भेदभाव, चयनात्मक आमंत्रण तथा पारदर्शिता से जुड़े मुद्दों पर अपना पक्ष रखेगा। यदि इसके बावजूद व्यवस्था में अपेक्षित सुधार नहीं होता है, तो उपलब्ध अभिलेखों एवं तथ्यों के आधार पर माननीय उच्च न्यायालय में जनहित याचिका (PIL) दायर करने सहित अन्य वैधानिक एवं कानूनी विकल्पों पर भी विचार किया जा सकता है।

सरकारी संस्थानों की साख केवल उनकी योजनाओं और उपलब्धियों से नहीं, बल्कि उनकी कार्यप्रणाली की निष्पक्षता और पारदर्शिता से भी तय होती है। यदि सूचना वितरण की प्रक्रिया पर पक्षपात या चयनात्मकता के आरोप लगते हैं, तो इससे विभाग की विश्वसनीयता प्रभावित होना स्वाभाविक है।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या एमवीवीएनएल में सरकारी सूचनाओं तक पहुंच सभी पत्रकारों के लिए समान और निष्पक्ष रहेगी, या फिर यह अधिकार कुछ चुनिंदा लोगों तक सीमित रहेगा? इसका स्पष्ट, पारदर्शी और तथ्यपरक उत्तर विभाग एवं उसकी जनसंपर्क व्यवस्था को देना होगा।

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