TET अनिवार्यता के खिलाफ देशभर के शिक्षकों का दिल्ली में महाप्रदर्शन, सरकार से फैसले पर पुनर्विचार की मांग

जनपत की खबर , 155

नई दिल्ली। नई दिल्ली के रामलीला मैदान में शनिवार को देशभर से आए हजारों शिक्षकों ने एकजुट होकर अपनी ताकत दिखाई। Teachers Federation of India के बैनर तले कश्मीर से कन्याकुमारी तक के लाखों शिक्षकों ने इस रैली के माध्यम से साफ संदेश दिया कि उनके साथ हो रहे कथित अन्याय को अब बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
यह प्रदर्शन सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश के विरोध में किया गया, जिसमें 2011 से पहले नियुक्त शिक्षकों के लिए शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) पास करना अनिवार्य कर दिया गया है। शिक्षकों का कहना है कि यह निर्णय उनके साथ अन्यायपूर्ण है, क्योंकि वे वर्षों से शिक्षण कार्य कर रहे हैं और अब करियर के अंतिम पड़ाव पर उनसे दोबारा परीक्षा देने की अपेक्षा की जा रही है।
रैली में शामिल शिक्षकों ने अपनी समस्याएं खुलकर सामने रखीं। 50 से 58 वर्ष आयु वर्ग के कई शिक्षकों ने कहा कि इस उम्र में परीक्षा देना उनके लिए बेहद कठिन है। एक शिक्षिका ने भावुक होकर कहा कि उन्होंने पूरी जिंदगी छात्रों को पढ़ाने में समर्पित कर दी, लेकिन अब सेवानिवृत्ति के करीब उनसे परीक्षा की मांग की जा रही है।
शिक्षक संगठनों का तर्क है कि यह निर्णय वैसा ही है जैसे किसी अनुभवी डॉक्टर से दोबारा प्रवेश परीक्षा पास करने को कहा जाए। उन्होंने सुझाव दिया कि सरकार पुराने शिक्षकों के लिए TET की अनिवार्यता के बजाय प्रशिक्षण (ट्रेनिंग) का विकल्प उपलब्ध कराए, ताकि वे नए शिक्षा तंत्र के अनुरूप स्वयं को अपडेट कर सकें।
रैली में शामिल प्रतिनिधियों ने सरकार से मांग की कि 2010 से पहले नियुक्त सभी शिक्षकों को TET से छूट दी जाए और इस संबंध में अध्यादेश लाया जाए। उनका कहना है कि बिना शिक्षकों की राय लिए ऐसा निर्णय लेना लाखों परिवारों के भविष्य को प्रभावित कर सकता है।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के अनुसार, शिक्षा का अधिकार (RTE) कानून लागू होने से पहले नियुक्त शिक्षकों को अगले दो वर्षों के भीतर TET परीक्षा पास करनी होगी, अन्यथा उनकी नौकरी खतरे में पड़ सकती है। देशभर में ऐसे शिक्षकों की संख्या लगभग 20 लाख बताई जा रही है, जिनमें से करीब 2 लाख उत्तर प्रदेश से हैं।
शिक्षकों ने स्पष्ट रूप से कहा कि उनकी नियुक्ति उस समय की निर्धारित शर्तों के आधार पर हुई थी, इसलिए अब नए नियमों को पिछली तारीख से लागू करना न्यायसंगत नहीं है। उन्होंने सरकार से मांग की कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के “retrospective effect” को समाप्त करने के लिए कानून बनाया जाए।
रैली के मुख्य अतिथि सांसद जगदंबिका पाल ने शिक्षकों को आश्वासन दिया कि उनकी आवाज प्रधानमंत्री तक पहुंचाई जाएगी और उनके हितों की रक्षा की जाएगी।
फिलहाल यह मुद्दा तेजी से राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक और सामाजिक बहस का विषय बनता जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि इसका समाधान संतुलित तरीके से निकाला जाना चाहिए, ताकि शिक्षा की गुणवत्ता भी बनी रहे और अनुभवी शिक्षकों के साथ अन्याय भी न हो।

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