मनुष्य को भगवान के आश्रित होकर जीवन जीना चाहिए --- महात्मा नरसिंह दास जी

राष्ट्रीय , 255

गीता का सार ही है भगवत् शरणागति

प्रयागराज/लखीमपुर। महाकुंभ मेला में सदानन्द तत्त्वज्ञान परिषद् के तत्वावधान में प्लॉट २२, सेक्टर 18 हरिश्चंद्र चौराहा में सत्संग करते हुए सन्त ज्ञानेश्वर स्वामी सदानन्द जी परमहंस से तत्त्वज्ञान प्राप्त महात्मा नरसिंह दास ने कहा भगवत शरणागति सम्पूर्ण साधनों में श्रेष्ठ है। गीता के अन्त में भी भगवान ने शरणागति की बात कही है और इसे 'सर्वगुह्यतम' बताया है। शरण में जाना जीव का काम है, उद्धार करना भगवान का काम है। भगवान ने जीव को अपने कल्याण-उद्धार के लिए स्वतंत्रता दी है। शरण होकर जीव निश्चिन्त, निःशोक, निर्भय और निःशंक हो जाता है। शरण होना गीता का अन्तिम सिद्धान्त है। श्री भगवान जी की शरणागति सम्पूर्ण गीता की सार बात है।
उन्होंने कहा भगवान श्री कृष्ण जी कहते हैं सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः।।
गीता 18.66।।
अर्थात- सम्पूर्ण धर्मोंका आश्रय छोड़कर तू केवल मेरी शरणमें आ जा। मैं तुझे सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त कर दूँगा, चिन्ता मत कर।
जब तक अपने बल, बुद्धि, विद्या, धन आदि का आश्रय रहता है, तब तक असली शरणागति नहीं होती।
द्रौपदी चीर हरण का उदाहरण देते हुए महात्मा जी ने कहा कि जब तक द्रौपदी को अपने पांच पतियों के बल सामर्थ्य पर भरोसा था तब तक भगवान ने कुछ नहीं किया लेकिन जब अपने पतियों से निराश होकर द्रौपदी भगवान श्री कृष्ण के शरणागत होकर उनका पुकार किया तो तत्काल ही भगवान ने द्रौपदी का कष्ट निवारण किया । भगवान शरणागत वत्सल होते हैं । इसीलिए हम सभी मनुष्य को एकमात्र भगवान के ही आश्रित होना रहना चाहिए ।

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