नवरात्र के नौवें दिन माँ सिद्धिदात्री की पूजा

जनपत की खबर , 1090

नवरात्र के नौवें दिन माँ सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है
माँ सिद्धिदात्री का रूप अत्यंत सौम्य है माँ की चार भुजाएं हैं दायीं भुजा में माता ने चक्र और गदा धारण किया है बांयी भुजा में शंख और कमल का फूल है माँ सिद्धिदात्री कमल आसन पर विराजमान रहती है माँ की सवारी सिंह है देवी माँ ने माँ सिद्धिदात्री का यह रूप भक्तों पर अनुकम्पा बरसाने के लिये धारण किया है, देवतागण, ऋषि-मुनि, असुर, नाग, मनुष्य सभी मां के भक्त है माँ सिद्धिदात्री की भक्ति जो भी हृदय से करता है माँ उसी पर अपना स्नेह लुटाती है पुराण के अनुसार भगवान शिव ने माँ सिद्धिदात्री की कृपा से सिध्दियों को प्राप्त किया था तथा माँ सिद्धिदात्री के द्वारा भगवान शिव को अर्धनारीश्वर रूप प्राप्त हुआ था अणिमा, महिमा,गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व ये आठ सिद्धियां माँ सिद्धिदात्री के है।
॥माँ सिद्धिदात्री ध्यान मंत्र ॥
सिद्धगन्धर्वयक्षाघरसुरैरमरैरपि सेव्यमाना।
सदा भूयात् सिद्धिदा सिद्धिदायिनी ॥
॥माँ सिद्धिदात्री बीज मंत्र॥
ऊँ ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे नमो नम:॥
॥माँ सिद्धिदात्री स्तुति मंत्र॥
या देवी सर्वभूतेषु माँ सिद्धिदात्री रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।
॥माँ सिद्धिदात्री ध्यान मंत्र॥
वन्दे वांछित मनोरथार्थ चन्द्रार्घकृत शेखराम्।
कमलस्थितां चतुर्भुजा सिद्धीदात्री यशस्वनीम्॥
स्वर्णावर्णा निर्वाणचक्रस्थितां नवम् दुर्गा त्रिनेत्राम्।
शख, चक्र, गदा, पदम, धरां सिद्धीदात्री भजेम्॥
पटाम्बर, परिधानां मृदुहास्या नानालंकार भूषिताम्।
मंजीर, हार, केयूर, किंकिणि रत्नकुण्डल मण्डिताम्॥
प्रफुल्ल वदना पल्लवाधरां कातं कपोला पीनपयोधराम्।
कमनीयां लावण्यां श्रीणकटि निम्ननाभि नितम्बनीम्॥
॥माँ सिद्धिदात्री स्तोत्र पाठ॥
कंचनाभा शखचक्रगदापद्मधरा मुकुटोज्वलो।
स्मेरमुखी शिवपत्नी सिध्दिदात्री नमोअस्तुते॥
पटाम्बर परिधानां नानालंकारं भूषिता।
नलिस्थितां नलनार्क्षी सिद्धीदात्री नमोअस्तुते॥
परमानंदमयी देवी परब्रह्म परमात्मा।
परमशक्ति, परमभक्ति, सिध्दिदात्री नमोअस्तुते॥
विश्वकर्ती, विश्वभती, विश्वहर्ती, विश्वप्रीता।
विश्व वार्चिता विश्वातीता सिध्दिदात्री नमोअस्तुते॥
भुक्तिमुक्तिकारिणी भक्तकष्टनिवारिणी।
भव सागर तारिणी सिध्दिदात्री नमोअस्तुते॥
धर्मार्थकाम प्रदायिनी महामोह विनाशिनी।
मोक्षदायिनी सिद्धीदायिनी सिध्दिदात्री नमोअस्तुते॥
॥माँ सिद्धिदात्री कवच॥
ओंकारपातु शीर्षो मां ऐं बीजं मां हृदयो।
हीं बीजं सदापातु नभो, गुहो च पादयो॥
ललाट कर्णो श्रीं बीजपातु क्लीं बीजं मां नेत्र घ्राणो।
कपोल चिबुको हसौ पातु जगत्प्रसूत्यै मां सर्व वदनो॥
जो साधक सिद्धियां हासिल करने के उद्देश्य से,माँ सिद्धिदात्री की पूजा करते हैं, उन्हें नवमी के दिन "निर्वाण चक्र" का भेदन करना चाहिए इस् दिन साधक का मन "निर्वाण चक्र" में अवस्थित होता हैं...
जो व्यक्ति भक्ति भाव एवं श्रद्धा से माँ सिद्धिदात्री की पूजा करते हैं उन्हें सुख, आरोग्य की प्राप्ति होती है, किसी प्रकार का भय नहीं सताता है माँ सिद्धिदात्री रोग, संताप एवं ग्रह बाधा से भक्तों की रक्षा करती है,एवं मन से भय को दूर रखती है माँ की कृपा से भक्तो की मुराद पूरी होती है,और घर में सुख, शांति एवं समृद्धि रहती है माँ सिद्धिदात्री के प्रसन्न होने पर सम्पूर्ण जगत की रिद्धि सिद्धि,माँ अपने भक्तों को प्रदान करती है।

 नवरात्र के समापन यानि नवम दिवस में सिद्धि प्रदान कराने वाली देवी सिद्धिदात्री देवी की पूजा की जाती है सिद्धि का अर्थ भौतिक वैभव नहीं अपितु आध्यात्मिक वैभव प्राप्त करना है जो  सुधि दिलाए वही सिद्धि है जो विस्मरण करादे वह दौलत किसी काम की नहीं वह बाहर से तो तृप्त करती है पर भीतर का खालीपन नहीं जाता 9 दिन के ये व्रत, अनुष्ठान व्यक्ति को शारीरिक और आत्मिक रूप से शुद्ध करते हैं जिसका जीवन शुद्ध है वही बुद्ध है और वही सच्ची सिद्धि को प्राप्त कर पाता है...
शैल (पत्थर) पुत्री अर्थात जड़त्व से प्रारम्भ होने वाला यह पर्व सिद्धिका पर जाकर सम्पन्न होता है जीवन का प्रारम्भ चाहे मूढ़ता से हो कोई बात नहीं पर समाप्ति सिद्धि (ज्ञान प्राप्ति) से हो यही जीवन की वास्तविक उन्नति है माँ से प्रार्थना ऐसी सिद्धि दे दो...

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