सीखने की ललक _

परिवेश , 526

उच्चकोटि की समझ पाने व इसे विकसित करने के लिए जिन्दगी, समाज व परिवेश को बड़े विस्तार के साथ जितना डूबकर पढ़ना जरूरी होता है, उतना ही शास्त्रीय व सर्जनात्मक पुस्तकों का वृहद अनुशीलन भी अनिवार्य होता है।

कोरा किताबी होना खतरनाक है लेकिन किताब से दूर होना जीवन के एक बहुत बड़े आयाम, विस्तीर्ण सम्भवनाओं से विलग होना है।

व्यक्ति-सत्य और आत्मानुभव ही अन्ततोगत्वा जीवन और समाज की कसौटी को नये प्रारूप में ढालने में सक्षम होते हैं, इसीलिए प्रामाणिक व्यक्ति को सतत जाग्रत, सक्रिय व तत्वान्वेषी बनना पड़ता है।

जीवन के आधारभूत पहलू/सन्दर्भ/तथ्य समझने के लिए बहुत ज्यादा जरूरी होता है कि व्यावहारिक अनुभवों/पक्षों को एनरिच किया जाए -- किताबी ज्ञान की अर्थवत्ता दो तरफा होती है, एक तरफ उसमें मौजूद अनुभव व रक्त-सामग्री व्यावहारिक जमीन को ठोस ढंग से पकड़े हुए हो दूसरे उसके भीतर विचारों व अनुभवों की जीवन्त रोशनी इतनी ऊर्जस्वित हो कि व्यवहार-धरातल के नए परिमाप भी निर्मित हो सकें !

ज्यादातर लोगों में बहुत से जरूरी मुद्दों -- यथा, सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक, ऐतिहासिक, धार्मिक व मनोवैज्ञानिक सन्दर्भों पर पारदर्शी व परिपक्व दृष्टि का अभाव इसी बौद्धिक व्यावहारिक अनुभव-ज्ञान के छूँछ होने के कारण आजीवन बना रहता है।

शिक्षा प्रणाली व अध्ययन-केंद्रों के साथ स्कूलों, विश्वविद्यालयों, परिवेश व घर परिवार के भीतर इस तरह व्यक्तित्व निर्माण व व्यक्ति-क्षमता के विकास की बहुत ज्यादा आवश्यकता है।

बहुत आवश्यक जरूरी चीजों को सीखने की अधिकतम उम्र 25 वर्ष होनी चाहिए। ऐसे ही लोग राष्ट्र के स्वरूप को ढंग से बदल पाते हैं।

बाकी क्या -- जीवन भर सीखने की ललक होनी चाहिए -- उसका कोई अन्त नहीं है।

यह स्वयं के यानी खुद मेरे द्वारा व्यक्तित्व निर्माण के ऐसे आयाम समयबद्धता में डेवलप न कर पाने की खीज तो है ही, एक चेतावनी भी है समाज व परिवेश के लिए..!!

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प्रफुल्ल सिंह "बेचैन कलम"
युवा लेखक/स्तंभकार/साहित्यकार
लखनऊ, उत्तर प्रदेश
सचलभाष/व्हाट्सअप : 6392189466
ईमेल : prafulsingh90@gmail.com

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