*धर्म के खतरे की बातें करता कलयुग*
परिवेश Feb 02, 2022 at 04:02 PM , 494भारतीय सनातन धर्म का आधार ही वेद और वेदांग से बहुत पहले शुरु हो चुका था। ओंकार के नाथ से शुरू हुआ हमारा ब्रह्मांड,छिति जल पावक गगन समीरा। पंच रचित अति अधम सरीरा पंच तत्वों से शुरू हुआ हमारा जीवन.... हमने सिंधुघाटी सभ्यता के खंडहर देखे हैं जहां किसी और धर्म के नहीं सनातन धर्म के ही चिन्ह प्राप्त होते हैं। भारत रूपी तपोभूमि के ऋषियों ने हमें ऋग्वेद ,यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद जैसे अपौरुषेय ग्रंथ दिए तो वही प्रकृति सहित पंचतत्व की उपासना के मंत्र दिए,अग्नि, वायु, अंगिरा और आदित्य जैसे आदिकालीन श्रुता दिएऔर इनकी रिचाए प्रदान की। वैदिक संस्कृति अपने आप में एक महान संस्कृति है। हिंदू धर्म का आधार स्तंभ वैदिक संस्कृति की बनी। प्रकृति को हमने मंत्रों में बांधना सीखा अपनी दैनिक दिनचर्या को आचार विचार और संस्कृति में बांधना हमने दुनिया को सिखाया।
भारत देश ने विपरीत समय भी देखे हैं यदि बात शुरुआत से की जाए तो धार्मिक रीति रिवाज में बढ़ रहे आडंबरो के कारण ज्यादा से ज्यादा लोग छोभ वस बौद्ध धर्म स्वीकार करने लगे थे। तभी एक 32 वर्षीय युवा जोकि साक्षात भगवान शिव के अवतार थे धरती पर अवतरित होते हैं और एक बार नहीं कई बार पूरे भारत का भ्रमण पैदल ही करके 4 ऐसे आधारभूत स्तंभ हिंदू धर्म को प्रदान करते हैं जो आज भी अक्षुण हैं।भारतीय सनातन धर्म में बद्रीनाथ, द्वारका, जगन्नाथ पुरी और रामेश्वरम चार धाम के रूप में शंकराचार्य द्वारा भारतीय धर्म दर्शन को प्रदान किए गए। और कुरीतियों के अतिशय से डगमगा ते सनातन धर्म को आधार प्रदान करते हैं।
समय आगे बढ़ता गया
भारत पर प्रथम विदेशी आक्रमण ईरान के हखमनी वंश के राजाओं ने किया। हखमनी वंश का संस्थापक साइरस-2(कुरूष) था। भारत पर पहला विदेशी आक्रमण करने का असफल प्रयास 550 ईसा पूर्व में ईरान के सम्राट सायरस द्वारा किया गया , अक्रांता थे फिर भी भारत वासियों ने इनसे खरोष्ठी लिपि सीखी ज्योतिष का ज्ञान प्राप्त किया।
ईरानी आक्रमण के बाद मकदूनिया से सिकंदरा आया सिकंदर ने 326 ईसवी पूर्व भारत पर आक्रमण किया। इनसे हमने अरमाइक सीखी। मिनांडर शक , कुषाणों और हुणो का आक्रमण हमने देखा। पर इन से भी कुछ ना कुछ हमारी संस्कृति ने लिया और इन्हें भी बदले में ज्ञान की सनातन धारा प्रदान की।
शक, कुषाण और हूणों के पतन के बाद भारत का पश्चिमी छोर कमजोर पड़ गया अब बारी थी अरब और ईरानी आक्रमण की।अरबों के बाद तुर्कों ने भारत पर आक्रमण किया।इस्लाम के विस्तार और धन, सोना तथा स्त्री प्राप्ति के उद्देश्य से उसने भारत पर 1001 से 1026 ई. के बीच 17 बार आक्रमण किए। सोमनाथ मंदिर को 17 बार लगातार लूटा गया इसके बाद भी सोमनाथ मंदिर भी अपनी जगह स्थित है और हिंदू सनातन धर्म भी।इस मंदिर को लूटते समय महमूद ने लगभग 50,000 ब्राह्मणों एवं हिन्दुओं का कत्ल कर दिया। इसके बावजूद हम कायम हैं।
मोहम्मद बिन कासिम के बाद महमूद गजनवी और उसके बाद मुहम्मद गौरी ने भारत पर आक्रमण कर अंधाधुंध कत्लेआम और लूटपाट मचाई। क्रमश: गुलाम, खिलजी और तुगलक वंश ,लोधी, मुगल और अफगान शासकों ने सनातन धर्म को मिटाने का बहुत लंबा प्रयास किया।
17वीं शताब्दी के प्रारंभ में अंग्रेजों की ईस्ट इंडिया कंपनी का क्रूरतम शासन हम सब ने देखा 1947 तक लाखों जाने कुर्बान कर हमें स्वतंत्र भारत की फिजा में सांसे ली।
निश्चित रूप से अंग्रेजों ने हिंदू धर्म पर अंग्रेजीअत का चोला पहन आया गया मैकाले की शिक्षा नीति का प्रहार हुआ और हमें हिंदू मुस्लिम जैसे दंगों पर उलझा कर हमारी मनोवृतियों को दूषित कर दियाहमे बटवारे का दंश दिया गया। असंख्य आक्रमण देखने के बाद भी भारत बटा नहीं था, हमने रोककर बिलख कर अपनों को अलग नहीं किया था।
हजारों वर्षों तक अपने देश ,अपने सनातन धर्म और परंपरा की रक्षा करने में जुटा सनातनी परिवार कई बार आहत हुआ ,कई बार चोटिल हुआ और कई बार हारने के कगार पर भी पहुंचा पर यह आत्मशक्ति थी ,हमारे संस्कार थे कि हम कितने भी धर्म परिवर्तन के हत्याचारी हाथों को खेलें पर आज भी सनातनी है।
भारत में, समाज और धर्म परस्पर जुड़े हुए हैं। इसलिए धार्मिक बुराइयों, जैसे अंधविश्वास, सती प्रथा ,पर्दा प्रथा, बाल विवाह, अन्य लोगों ने समाज को बार-बार प्रभावित किया जिसके कारण हमें कठोर नियम बनाने पड़े।
बाद में धर्मगुरुओं के साथ-साथ भारतीय समाज सुधारकों ने भी इस तरह के प्रचलित रिवाजों से लोगों को मुक्त करने का प्रयास किया। विभिन्न धार्मिक और सामाजिक पृष्ठभूमि से प्रभावित होकर, उन्होंने जनता को शिक्षित करने के लिए सरल तरीके अपनाए हैं। स्वामी विवेकानंद, ईश्वर चंद्र विद्यासागर, रामकृष्ण परमहंस, दयानंद सरस्वती, राजा राम मोहन रॉय और अन्य भारतीय हस्तियों ने महिलाओं के विकास और ज्ञान के लिए बात की। ब्रिटिश शासन के तहत भारतीय समाज सुधारकों ने भी पश्चिमी शिक्षा को लोकप्रिय बनाया। 18वीं शताब्दी में यूरोप में एक नवीन बौद्धिक लहर चली, जिसके फलस्वरूप जागृति के एक नये युग का सूत्रपात हुआ। तर्कवाद तथा अन्वेषणा की भावना ने यूरोपीय समाज को प्रगति प्रदान की। भारत का एक नवीन पाश्चात्य शिक्षित वर्ग भी तर्कवाद, विज्ञानवाद तथा मानववाद से प्रभावित हुये बिना नहीं रह सका। इन पाश्चात्य शिक्षित भारतीयों ने इस नवज्ञान से प्रभावित होकर सामाजिक एवं धार्मिक सुधार का कार्य प्रारंभ किया।सबसे प्रमुख भारतीय समाज सुधारकों में, महात्मा गांधी, श्रीराम शर्मा आचार्य, वीरचंद गांधी, गोपाल हरि देशमुख, जमनालाल बजाज, बालशास्त्री जम्भेकर, जवाहरलाल नेहरू, विनोबा भावे, धोंडो केशव कर्वे, एनी बेसेंट उल्लेखनीय हैं। हजारों वर्षों के गुलामी और दूसरे शासकों के शासनकाल को हमने अपनी जड़ों में रची बसी भारतीय संस्कृति और सनातन परंपराओं से अनवरत रखा। कुरीतिया मिटी, समानता, सहिष्णुता और आत्मसम्मान कायम रहा।
ॐ के प्राकृतिक नाथ और आवाहन से शुरू हुआ सनातन धर्म जो आज अपने हिंदू धर्म के वैकल्पिक नाम से भी जाना जाता है हमारे ऋषि-मुनियों ने ध्यान और मोक्ष की गहरी अवस्था में ब्रह्म, ब्रह्मांड और आत्मा के रहस्य को जानकर उसे स्पष्ट तौर पर व्यक्त किया और आज पूरे विश्व में सर्वमान्य है। वेदों में ही सर्वप्रथम ब्रह्म और ब्रह्मांड के रहस्य पर से पर्दा हटाकर 'मोक्ष' की धारणा को प्रतिपादित कर उसके महत्व को समझाया गया । मोक्ष के बगैर आत्मा की कोई गति नहीं इसीलिए ऋषियों ने मोक्ष के मार्ग को ही सनातन मार्ग माना है। इसकी उत्पत्ति मानव की उत्पत्ति से भी पहले से है।विद्वान लोग हिन्दू धर्म को भारत की विभिन्न संस्कृतियों एवं परम्पराओं का सम्मिश्रण मानते हैं जिसका कोई संस्थापक नहीं है।
जब पूरा विश्व रोटी कपड़ा और जीवन के लिए लड़ रहा था तब हमारा सनातन धर्म विश्वको मोक्ष के शिक्षा दे रहा था।
यदि भारतीय दर्शन की बात करें तो आस्तिक दर्शन छ: हैं जिन्हें न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग, मीमांसा और वेदान्त कहा जाता है। इनके विपरीत चावार्क, बौद्ध और जैन दर्शनों को 'नास्तिक दर्शन' के वर्ग में रखा जाता है। ... इस प्रकार भारत के विभिन्न दर्शनों में जो साम्य दिखाई पड़ते हैं, उन्हें “भारतीय दर्शन की सामान्य विशेषताएँ” कहा जाता है। और यह भारतीय दर्शन ही है जिसने हमें विश्व गुरु बनाया और हम गीता को सभी धर्मों का आधार बताने में और पूरे विश्व में हिंदू धर्म की पताका लहरानेमें सफल हुए। सनातन धर्म के एक साधु ने जो पहली बार समुद्र पार किया तो विश्व धर्म संसद मेंसनातन गूंजहुई ।विवेकानंद जैसे योग्य गुरु के कारण विश्व में पताका फहराने में सफल हुए।
आशावाद की विचारधारा से ओतप्रोत शंकराचार्य के सच्चिदानंद और अहम् ब्रह्मास्मि के स्वरूप को धारण करता हुआ ईश्वर वादी आस्तिक दर्शन जो हमेशा भारत वर्ष को आत्म सम्मान और गौरव पूर्ण जीवन जीने की शिक्षा देता रहा जिसने इस लोक और परलोक दोनों के उन्नत होने की कामना की हो वह सनातन धर्म और उसकी परंपराएं कभी मिटाई जा सकती हैं ???यह कैसे सोचा जा सकता है ।
निश्चित रूप से आज आवश्यकता है आपको हमें और हमारे देशवासियों को खुद पर विश्वास कायम करने की.....।
कुछ बात है कि हस्ती, मिटती नहीं हमारी। सदियों रहा है दुश्मन, दौर-ए-ज़माँ हमारा।..............सारे जहाँ से अच्छा, हिन्दोस्ताँ हमारा।
हम बुलबुलें हैं इसकी, यह गुलिसताँ हमारा।।
???????????????? @रीना त्रिपाठी































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