किशोर न्याय अधिनियम के दस वर्ष पूरे, लखनऊ में राज्य स्तरीय हितधारक परामर्श आयोजित

जनपत की खबर , 15

लखनऊ, 22 अगस्त 2026। 

किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015 के दस वर्ष पूरे होने के अवसर पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की किशोर न्याय समिति (HCJJC) द्वारा महिला एवं बाल विकास विभाग, उत्तर प्रदेश तथा यूनिसेफ, लखनऊ के सहयोग से न्यायिक प्रशिक्षण एवं अनुसंधान संस्थान, उत्तर प्रदेश, लखनऊ में एक दिवसीय ‘राज्य स्तरीय हितधारक परामर्श-2026’ का आयोजन किया गया।

नालंदा सभागार में आयोजित उद्घाटन सत्र में इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एवं जेटीआरआई के पदेन मुख्य संरक्षक न्यायमूर्ति अरुण भंसाली, वरिष्ठ न्यायाधीश एवं जेटीआरआई की पर्यवेक्षण समिति के अध्यक्ष न्यायमूर्ति राजन रॉय तथा उच्च न्यायालय किशोर न्याय समिति के अध्यक्ष न्यायमूर्ति अजय भनोट की गरिमामयी उपस्थिति रही। महिला एवं बाल विकास विभाग की अपर मुख्य सचिव लीना जौहरी सहित अन्य विशिष्ट अतिथि और संबंधित हितधारक भी कार्यक्रम में शामिल हुए।

मुख्य अतिथि न्यायमूर्ति अरुण भंसाली ने कहा कि बाल संरक्षण राज्य और समाज दोनों की वैधानिक एवं नैतिक जिम्मेदारी है। उन्होंने किशोर न्याय अधिनियम, 2015 के दस वर्ष पूरे होने के अवसर पर बच्चों के सर्वोत्तम हित, गरिमा, पुनर्वास और पुनर्समेकन को दिए गए महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने किशोर न्याय बोर्डों (JJBs), बाल कल्याण समितियों (CWCs), बाल देखरेख संस्थानों, डिजिटल दत्तक ग्रहण प्रक्रियाओं तथा मजबूत निगरानी तंत्र के माध्यम से हुई संस्थागत प्रगति का उल्लेख किया।

उन्होंने कहा कि अधिनियम के दस वर्ष पूरे होना केवल उपलब्धियों को स्वीकार करने का अवसर नहीं, बल्कि ईमानदारीपूर्वक यह मूल्यांकन करने का भी समय है कि कानून बच्चों के जीवन में वास्तविक और सार्थक बदलाव लाने में कितना सफल रहा है।

न्यायमूर्ति राजन रॉय ने भारत में किशोर न्याय व्यवस्था के विकास की यात्रा पर प्रकाश डालते हुए युवा अपराधियों के लिए पृथक व्यवस्था से वर्तमान व्यापक बाल संरक्षण प्रणाली तक हुए बदलावों को रेखांकित किया। उन्होंने किशोर न्याय अधिनियम, 1960 से लेकर किशोर न्याय अधिनियम, 1986, बाल अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र अभिसमय, 1989, किशोर न्याय अधिनियम, 2000 और किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015 को इस विकास यात्रा के प्रमुख पड़ाव बताया।

उन्होंने कहा कि किशोर न्याय व्यवस्था की सफलता का आकलन केवल मामलों के निस्तारण की संख्या से नहीं, बल्कि उन बच्चों की संख्या से किया जाना चाहिए जिन्हें संरक्षण, पुनर्वास, गरिमा और आशा के साथ जीवन जीने का अवसर मिला है।

न्यायमूर्ति अजय भनोट ने जमानत और बाल संरक्षण से जुड़े मामलों में बाल-संवेदनशील दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने एक ऐसे मामले का उल्लेख किया, जिसमें जघन्य अपराध के आरोप में विचारण का सामना कर रही मां की जमानत अस्वीकार कर दी गई थी। उन्होंने कहा कि मां के कारावास के कारण बच्चे को दंडित नहीं किया जाना चाहिए। न्यायमूर्ति ने कहा कि कानून की सीमाओं के भीतर न्यायिक विवेक का प्रयोग बच्चों के अधिकारों और कल्याण को आगे बढ़ाने के लिए किया जाना चाहिए।

उन्होंने पुनर्वास एवं पुनर्समेकन को समग्र शिक्षा का अभिन्न अंग बताते हुए बौद्धिक विकास, चरित्र निर्माण, शारीरिक स्वास्थ्य, योग, ध्यान और बागवानी जैसी व्यावहारिक गतिविधियों को इसमें शामिल करने पर भी जोर दिया।

महिला एवं बाल विकास विभाग की अपर मुख्य सचिव लीना जौहरी ने बाल संरक्षण के क्षेत्र में पिछले एक दशक के सुधारों पर प्रकाश डाला। उन्होंने बाल संरक्षण तंत्र को सुदृढ़ करने तथा बच्चों के अधिकारों, कल्याण और सर्वोत्तम हितों की रक्षा के लिए किए जा रहे उपायों के प्रभावी क्रियान्वयन की आवश्यकता पर बल दिया।

कार्यक्रम के दौरान ‘उड़ान’ पुस्तक के तृतीय संस्करण का औपचारिक विमोचन भी किया गया। मुख्य न्यायाधीश ने लखनऊ स्थित ‘दृष्टि’ सामाजिक संस्थान के विशेष रूप से सक्षम बच्चों को आशीर्वाद प्रदान किया तथा गणमान्य अतिथियों द्वारा बच्चों को उपहार वितरित किए गए।

जेटीआरआई की निदेशक रेखा अग्निहोत्री ने मुख्य अतिथि एवं अन्य गणमान्य अतिथियों का स्वागत किया और परामर्श के विषय की प्रासंगिकता एवं महत्व पर प्रकाश डाला। उद्घाटन सत्र का समापन यूनिसेफ के अधिकारी के धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ। कार्यक्रम का संचालन संस्थान के उप निदेशकों द्वारा किया गया।

दिनभर चले परामर्श सत्रों में उत्तर प्रदेश के जिला न्यायाधीश, विशेष न्यायाधीश (POCSO), किशोर न्याय बोर्डों के प्रधान मजिस्ट्रेट सहित अन्य प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया। पुलिस, लोक प्रशासन, परिवीक्षा विभाग तथा किशोर न्याय अधिनियम से जुड़े विभिन्न हितधारकों के प्रतिनिधियों ने भी सहभागिता की।

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