**सम्पादकीय: सिर्फ ग्रांट और एक शिक्षक के भरोसे कैसे सुधरेगी शिक्षा व्यवस्था?**
जनपत की खबर Aug 17, 2026 at 06:05 PM , 80सरकारी स्कूलों की शिक्षा व्यवस्था में सुधार की चर्चा अक्सर शिक्षकों की जिम्मेदारी, हेडमास्टर की कार्यप्रणाली और स्कूलों को मिलने वाली कम्पोजिट ग्रांट तक सीमित कर दी जाती है। लेकिन सवाल यह है कि क्या केवल कुछ हजार रुपये की ग्रांट और एक शिक्षक के भरोसे किसी विद्यालय की पूरी तस्वीर बदली जा सकती है? **जवाब साफ है—नहीं।**
अच्छी शिक्षा केवल किताबों और योजनाओं से नहीं, बल्कि **बेहतर कक्षाओं, पर्याप्त शिक्षकों, शिक्षण संसाधनों और अनुकूल शैक्षिक वातावरण** से मिलती है। जिस विद्यालय में कक्षा आठ तक 100 या 150 बच्चे हों और उन्हें पढ़ाने के लिए केवल एक शिक्षक उपलब्ध हो, वहां उस शिक्षक से गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की उम्मीद करना व्यावहारिक नहीं है। एक शिक्षक बच्चों को पढ़ाए, उनकी कॉपियां जांचे, अभिलेख तैयार करे, विभागीय सूचनाएं भेजे, ऑनलाइन पोर्टल अपडेट करे, बैठकों में शामिल हो और लगातार आने वाले आदेशों व व्हाट्सऐप संदेशों का जवाब भी दे—यह सब एक साथ कैसे संभव है?
आज सरकारी विद्यालयों का शिक्षक केवल शिक्षक नहीं रह गया है। उसके कंधों पर शिक्षण के साथ-साथ **दर्जनों प्रशासनिक और गैर-शैक्षणिक जिम्मेदारियां** भी हैं। कई बार हर कुछ मिनट में किसी न किसी ग्रुप पर नई सूचना, रिपोर्ट या निर्देश आ जाता है। ऐसे में शिक्षक का बहुमूल्य समय बच्चों के साथ कक्षा में बितने के बजाय कागजी और डिजिटल औपचारिकताओं में चला जाता है।
यह स्थिति किसी शिक्षक की कमजोरी नहीं, बल्कि **व्यवस्था की चुनौती** है।
सरकारें यदि सरकारी विद्यालयों को निजी विद्यालयों के बराबर गुणवत्ता देना चाहती हैं तो सबसे पहले बुनियादी ढांचे और मानव संसाधन की कमी दूर करनी होगी। **अच्छी बिल्डिंग बनाना शिक्षक का काम नहीं है, पर्याप्त शिक्षक उपलब्ध कराना भी शिक्षक की जिम्मेदारी नहीं है।** यह सरकार और शिक्षा विभाग की जिम्मेदारी है। शिक्षक का मूल दायित्व बच्चों को पढ़ाना है और उसे उसी कार्य के लिए पर्याप्त समय और संसाधन मिलने चाहिए।
किसी विद्यालय में रंगीन दीवारें, स्मार्ट क्लास, कम्पोजिट ग्रांट और आकर्षक योजनाएं तभी सार्थक होंगी, जब वहां बच्चों को पढ़ाने के लिए **हर कक्षा में पर्याप्त और योग्य शिक्षक** मौजूद हों। एकल शिक्षक विद्यालयों की समस्या पर गंभीरता से विचार करना होगा। यदि किसी अधिकारी को यह लगता है कि एक शिक्षक आसानी से 100-150 बच्चों को संभाल सकता है, तो उसे कुछ समय ऐसे ही विद्यालय में बैठकर वास्तविक परिस्थितियों को समझना चाहिए। तब शायद यह महसूस होगा कि जमीन पर शिक्षा देना फाइलों में योजना बनाने से कहीं अधिक कठिन काम है।
विद्यालय सुधार का सारा ठीकरा प्रधानाध्यापकों और शिक्षकों के सिर फोड़ देना आसान है, लेकिन इससे समस्या का समाधान नहीं होगा। **जवाबदेही जरूरी है, लेकिन जवाबदेही के साथ संसाधन और व्यवस्था देना उससे भी ज्यादा जरूरी है।**
शिक्षक को दोष देने से पहले यह पूछा जाना चाहिए कि उसे कितने बच्चे दिए गए, कितने शिक्षक उपलब्ध हैं, कितनी कक्षाएं हैं, पढ़ाने के लिए क्या संसाधन हैं और गैर-शैक्षणिक कार्यों का कितना बोझ है।
शिक्षा किसी भवन की चारदीवारी में चलने वाली प्रक्रिया नहीं, बल्कि राष्ट्र के भविष्य का निर्माण है। यदि हम चाहते हैं कि सरकारी विद्यालयों के बच्चे भी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त करें, प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं में आगे बढ़ें और आत्मविश्वास के साथ भविष्य का निर्माण करें, तो **'एक शिक्षक—सैकड़ों बच्चे'** वाली व्यवस्था को बदलना ही होगा।
सरकार को चाहिए कि विद्यालयों में शिक्षक-छात्र अनुपात को वास्तविक जरूरत के अनुसार मजबूत करे, विषयवार शिक्षकों की उपलब्धता सुनिश्चित करे, एकल शिक्षक विद्यालयों को प्राथमिकता के आधार पर शिक्षक उपलब्ध कराए, गैर-शैक्षणिक कार्यों को कम करे और विद्यालयों के आधारभूत ढांचे को मजबूत बनाए।
क्योंकि **शिक्षक को दोष देकर शिक्षा व्यवस्था नहीं सुधरेगी। शिक्षक को सक्षम बनाकर, विद्यालय को संसाधन देकर और हर बच्चे को पर्याप्त शिक्षक उपलब्ध कराकर ही बदलाव आएगा।**
आखिरकार, सवाल किसी एक शिक्षक, प्रधानाध्यापक या अधिकारी का नहीं है। सवाल उस बच्चे के भविष्य का है, जो उम्मीद लेकर सरकारी विद्यालय की कक्षा में बैठता है। **उस बच्चे को अच्छी शिक्षा देना सरकार, व्यवस्था और पूरे समाज की साझा जिम्मेदारी है।**































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