पुस्तकें सभ्यता और संस्कृति की उन्नति का सबसे बड़ा माध्यम: राज्यपाल हरिभाऊ बागडे
अन्य खबरे Feb 05, 2026 at 05:40 PM , 87जयपुर, 5 फरवरी।
राज्यपाल श्री हरिभाऊ बागडे ने कहा कि पुस्तकें किसी भी सभ्यता और संस्कृति की उन्नति का सबसे सशक्त माध्यम होती हैं। आज भारतीय ज्ञान परम्परा से जुड़ी पुस्तकें केवल मुद्रित सामग्री तक सीमित नहीं रह गई हैं, बल्कि डिजिटल माध्यमों के जरिए देश और समाज की सामूहिक चेतना एवं प्रतिभा का प्रतिबिंब बनती जा रही हैं। उन्होंने समयानुकूल प्राचीन पुस्तकों और पांडुलिपियों के संरक्षण के लिए व्यापक स्तर पर कार्य किए जाने का आह्वान किया।
राज्यपाल श्री बागडे गुरुवार को आगरा में केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा तथा भारतीय पुस्तकालय संघ के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित ‘कृत्रिम बुद्धिमत्ता के युग में पुस्तकालय सेवाओं का रूपान्तरण’ विषयक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन को संबोधित कर रहे थे। इस अवसर पर उन्होंने केंद्रीय हिंदी संस्थान ज्ञानकोश का ऑनलाइन शुभारंभ भी किया।
राज्यपाल ने भारत की समृद्ध ज्ञान विरासत का उल्लेख करते हुए कहा कि विदेशी आक्रांताओं ने हमारी सांस्कृतिक और बौद्धिक धरोहर को नष्ट करने की सुनियोजित रणनीति अपनाई। बारहवीं शताब्दी में बख्तियार खिलजी द्वारा नालंदा विश्वविद्यालय के पुस्तकालय को जलाना इसी मानसिकता का उदाहरण था, जिसका उद्देश्य भारत के समृद्ध ज्ञान को समाप्त करना था।
उन्होंने कहा कि दुर्लभ पांडुलिपियों और पुस्तकों के लुप्त होने की घटनाएं इस बात का प्रमाण हैं कि किस प्रकार ज्ञान और बौद्धिक विरासत को नष्ट करने के प्रयास किए गए। राज्यपाल ने कहा कि भारत वह देश है, जहां विश्व का सबसे प्राचीन और प्रथम उपलब्ध ग्रंथ ऋग्वेद रचा गया। इसे ऋषियों ने कंठ दर कंठ पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुरक्षित रखा और बाद में लिपिबद्ध किया गया।
राज्यपाल ने कहा कि तकनीकी विकास के इस युग में अब पुस्तकों और पांडुलिपियों को स्थायी रूप से सुरक्षित रखने के व्यापक अवसर उपलब्ध हैं। उन्होंने राष्ट्रपति द्वारा प्रस्तुत ‘वन नेशन, वन डिजिटल लाइब्रेरी’ की अवधारणा को ऐतिहासिक बताते हुए प्राचीन भारतीय ग्रंथों के अनुवाद की परंपरा को सशक्त करने पर बल दिया। उन्होंने कहा कि सांस्कृतिक विरासत, पांडुलिपियों और महत्वपूर्ण पुस्तकों का अधिकाधिक पठनीय भाषाओं में अनुवाद किया जाना आवश्यक है।
राज्यपाल ने कहा कि ब्रिटिश शासन के दौरान शिक्षा को रोजगार से जोड़ दिया गया, जिससे पुस्तकों को पढ़ने की प्रवृत्ति समझ और चिंतन के बजाय केवल रटने तक सीमित हो गई। इससे बौद्धिक क्षमता को नुकसान पहुंचा। जबकि भारतीय शिक्षा परंपरा में पुस्तकों का अध्ययन आत्मविकास और विचार निर्माण का माध्यम रहा है। यही कारण है कि भारत में पुस्तकों से एक समृद्ध विचार संस्कृति का विकास हुआ।



























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