नारी से नारायणी की यात्रा का पर्व ही नवरात्र है

जनपत की खबर , 924

नारी से नारायणी की यात्रा का पर्व ही नवरात्र है यह पर्व नारी के जीवन के उच्चतम स्तर को रेखांकित करता है दुनिया में कुछ लोग भले ही नारी को भोग की वस्तु या उसे अपने से कमतर आंकते हों मगर एक नारी चाहे तो कौन सा पद प्राप्त नहीं कर सकती ? माँ दुर्गा के चरित्र को देखो माँ का जन्म दिव्य है इसलिए इतने देवताओं के होते हुए वो पूज्या नहीं हुईं अपितु उनके कर्म दिव्य हैं इसलिए वो पूज्या हुईं परहित और परोपकार की भावना से जो कर्म करता है, देर से ही सही समाज उसको पूजता अवश्य है जगत की तो छोड़ो जगदीश प्राप्ति की भी जब गोपियों ने ठान ली और कृष्ण प्राप्ति के लिए माँ भगवती की शरण में गईं तो गोविन्द को भी प्राप्त कर लिया माँ के कात्यायनी स्वरूप की गोपियों ने आराधना की नवरात्र के 6वे दिन आज माँ कात्यायनी की ही पूजा की जाती है इनकी चार भुजाएँ हैं माताजी का दाहिनी तरफ का ऊपरवाला हाथ अभयमुद्रा में तथा नीचे वाला वरमुद्रा में है
बाईं तरफ के ऊपरवाले हाथ में तलवार और नीचे वाले हाथ में कमल-पुष्प सुशोभित है इनका वाहन सिंह है...
चन्द्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहना।
कात्यायनी शुभ दद्याद्देवी दानवघातिनी॥
देवि प्रपन्नार्तिहरे प्रसीद
प्रसीद मातर्जगतोऽखिलस्य।
प्रसीद विश्‍वेश्‍वरि पाहि विश्‍वं
त्वमीश्‍वरी देवि चराचरस्य॥दुर्गा सप्तसदी ११ /३॥
देवता बोले – शरणागत की पीड़ा दूर करने वाली देवि हम पर प्रसन्न हो सम्पूर्ण जगत की माता प्रसन्न होऒ विश्वेश्वरि! विश्व की रक्षा करो देवि! तुम्हीं चराचर जगत की अधीश्वरी हो...
सर्वमङ्‌गलमंङ्‌गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥दुर्गा सप्तसदी ११/१०॥
नारायणी! तुम सब प्रकार का मंगल प्रदान करने वाली मंगलमयी हो कल्याणदायिनी शिवा हो, सब पुरुषार्थों को सिद्ध करनेवाली, शरणागत वत्सला, तीन नेत्रों वाली एवं गौरी हो। तुम्हें नमस्कार है।

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