अदभुत कहानी : मकर संक्रांति की कहानी

हेडलाइंस , 977

हमारे देश  में प्रायः और अक्सर कोई ना कोई त्यौहार मनाया जाता है. प्रत्येक त्यौहार सिर्फ एक परंपरा नहीं है परंतु उन्हें मनाए जाने का प्रामाणिक वैज्ञानिक कारण भी उपलब्ध है. वर्ष के पहले महीने जनवरी  में मकर सक्रांति  का उत्सव मनाया जाता है. यह त्यौहार  भारतवर्ष के विभिन्न राज्यों में अलग-अलग नामों से अलग-अलग तरीकों से मनाया जाता है. जैसे बिहार और उत्तर प्रदेश में खिचड़ी पंजाब में  लोहड़ी दूसरे प्रदेशो में  पिहू और पोंगल.
पौष माह में जब सूर्य देव धनु राशि को छोड़कर मकर राशि में प्रवेश करते हैं. तब हिंदू धर्म का यह पर्व मकर सक्रांति के रूप मनाया जाता है. मकर संक्रांति के दिन सूर्य अपनी उत्तरायणी गति प्रारंभ करता है. इसलिए इस पर वह को उत्तरायणी पर्व भी कहा जाता है. भगवान शनिदेव मकर राशि के स्वामी हैं और इस दिन सूर्य मकर राशि में प्रवेश करते हैं इस दिन जप, तप, ध्यान और धार्मिक क्रियाकलापों का अधिक महत्व होता हैं. इसे फसल उत्सव भी कहा जाता हैं.
इस दिन से पहले सूर्य पृथ्वी के दक्षिणी गोलार्ध पर सीधी किरणें डालता है. जिसके कारण उत्तरी गोलार्ध में रात्रि बड़ी और दिन छोटा होता है. इसी वजह से ठंड का मौसम भी रहता है. इसी दिन से सूर्य पृथ्वी के उत्तरी गोलार्ध की ओर बढ़ना शुरू होता है. जिसके कारण मौसम में परिवर्तन होता है और यह कृषकों की फसलों के लिए फायदेमंद होता है. जैसा कि हम सभी जानते हैं भारत पृथ्वी के उत्तरी गोलार्द्ध पर स्थित हैं.
महाभारत युद्ध के महान योद्धा और कौरवों की सेना के सेनापति  भीष्म पितामह  को इच्छा मुत्यु का वरदान प्राप्त था. अर्जुन के बाण लगाने के बाद उन्होंने इस दिन की महत्ता को जानते हुए अपनी मृत्यु के लिए इस दिन को निर्धारित किया था. भीष्म जानते थे कि सूर्य दक्षिणायन होने पर व्यक्ति को मोक्ष प्राप्त नहीं होता और उसे इस मृत्युलोक में पुनः जन्म लेना पड़ता हैं. महाभारत युद्ध के बाद जब सूर्य उत्तरायण हुआ तभी भीष्म पितामह ने प्राण त्याग दिए. भीष्म के निर्वाण दिवस को  भीष्माष्टमी  भी कहते हैं.
एक धार्मिक मान्यता के अनुसार सक्रांति के दिन ही माँ गंगा स्वर्ग के अवतरित होकर राजा  भागीरथ के पीछे-पीछे कपिल मुनि के आश्रम से होती हुई गंगासागर तक पहुँची थी. धरती पर अवतरित होने के बाद राजा भागीरथ ने गंगा के पावन जल से अपने पूर्वजों का तर्पण किया था. इस दिन पर गंगा सागर पर नदी के किनारे भव्य मेले का आयोजन किया जाता हैं.
 यह भी कहा जाता हैं कि माता यशोदा ने संतान प्राप्ति के लिए ही इसी दिन व्रत रखा था. इस दिन महिलाएं तिल, गुड आदि दूसरी महिलाओं को बाँटती हैं. ऐसा माना जाता हैं कि तिल की उत्पत्ति भगवान् विष्णु से हुई थी. इसलिये इसका प्रयोग पापों से मुक्त करता हैं. तिल के उपयोग से शरीर निरोगी रहता है और शरीर में गर्मी का संचार रहता हैं.
भारत में फसलों का मौसम और मकर संक्रांति का त्यौहार बहुत उत्साह और खुशी के साथ मनाया जाता है. भारतीय आबादी का एक बड़ा हिस्सा किसानों का है. इसलिए, देश के अन्य हिस्सों संक्रांति अलग-अलग तरीके से मनाई जाती हैं.

तमिलनाडु में मनाया जाने वाला थाई पोंगल, भगवान इंद्र को श्रद्धांजलि देने के लिए चार दिनों का उत्सव है. यह त्यौहार भगवान इंद्र को भरपूर बारिश के लिए धन्यवाद देने का एक माध्यम है और इसलिए उपजाऊ भूमि और अच्छी उपज की कामना स्वरुप यह मनाई जाती हैं. थाई पोंगल समारोह भगवान सूर्य और भगवान इंद्र के लिए किए गए प्रसाद के बिना अधूरा है. थाई पोंगल के दूसरे दिन, ताजा पका हुआ चावल दूध में उबाला जाता है और इसे भगवान सूर्य को अर्पित किया जाता है. तीसरे दिन, मट्टू पोंगल ‘बसवा’- भगवान शिव के बैल को घंटियों, फूलों की माला, माला और पेंट के साथ सजाकर पूजा की जाती है. पोंगल के चौथे दिन, कन्नुम पोंगल मनाया जाता है जिसमें घर की सभी महिलाएँ एक साथ विभिन्न अनुष्ठान करती हैं.
इसे “बैसाखी” भी कहा जाता है, पंजाब में यह बहुत उत्साह के साथ मनाया जाने वाला एक फसल त्यौहार है. यह वसंत ऋतु के अनुरूप पंजाबी नववर्ष को भी चिह्नित करता है. यह त्यौहार एक दूसरे को स्वीकार करने और अच्छी फसल की कामना के लिए देवताओं को अर्पित करके के साथ मनाया जाता है. इसी दिन, 13 अप्रैल 1699 को दसवें गुरु गोविंद सिंह ने खालसा पंथ की स्थापना की थी. सिख इस त्योहार को सामूहिक जन्मदिवस के रूप में मनाते हैं.

गुजरात राज्य में मकर संक्रांति को उत्तरायण नाम से जाना जाता हैं. इसे विशेष रूप से गुजरात में अच्छी फसल के मौसम की शुरुआत के प्रतीक स्वरूप माना जाता हैं. इस त्यौहार पर पतंग उड़ाने, गुड़ और मूंगफली की चिक्की का दावत के रूप में लुफ्त उठाया जाता है. विशेष मसालों के साथ भुनी हुई सब्जी उत्तरायण के अवसर का मुख्य व्यंजन है.

भोगली या माघ बिहू असम का एक सप्ताह लंबा फसल त्यौहार है. यह पूह महीने के 29 वें दिन से शुरू होता है, जो 13 जनवरी को पड़ता है और लगभग एक सप्ताह तक चलता है. इस त्यौहार पर लोग हरे बांस और घास के साथ बनी विशेष संरचना “मेजी”  का निर्माण करते हैं और जलाते हैं. इस त्यौहार पर चावल के केक की दावत मुख्य व्यंजन होता है जिसे ‘शुंग पिठा’, ‘तिल पिठा’ और नारियल की मिठाइयों को ‘लारू’ कहा जाता है. असम के मूल निवासी टेकेली भोंगा जैसे खेलों का आयोजन करते हैं, जिसमें पॉट ब्रेकिंग और भैंस की लड़ाई शामिल है. इस तरह यह कहा जाता है कि नये साल के शुरुआत का यह पहला पर्व बड़े धूमधाम से अलग अलग राज्यों में बड़े उत्साह से मनाया जाता है .

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