रविन्द्रालय में नाटक "देवी आगमन" का हुआ सफल मंचन

हेडलाइंस , 1267

लखनऊ। 
मनोरंजन की दुनिया मे सदैव लोक कलाओं का बर्चस्व रहा है। स्वांग नाट्य विधा पर आधारित शैली 'नौटंकी' एक लंबे कालखंड तक भारतीय उपमहाद्वीप में मनोरंजन का सरताज रही। भारतीय सिनेमा के शुरुआती दौर में इस शैली का ख़ासा प्रभाव देखने को मिलता है। किंतु कालांतर में आधुनिक की अंधी दौड़ में नौटंकी इस तरह पिछड़ी कि आज हालत यह है कि नाट्य-कला की ये पुरातन भारतीय समृद्ध परंपरागत शैली दम तोड़ती नज़र आती है। 
हाल के वर्षों में सरकारी और ग़ैर सरकारी स्तर पर अपनी प्राचीन समृद्ध परम्पराओं को संरक्षित-प्रोत्साहित करने की चेतना जागी। देश का संस्कृति-मंत्रालय सजग-सक्रिय हुआ तो नाट्य विधा विशेषकर थियेटर से जुड़े सुधिजनो में भी नवचेतना जगृत हुई। हालाँकि सरकारी ग्रांट की मलाई चाटने को नाट्य-जगत में कुछ ऐसी 'बिल्लियां' भी सक्रिय हो गईं जिन्हें इस समृद्ध गौरवशाली विधा का अब सभी को नहीं पता। वो सिर्फ़ नौटंकी के पारम्परिक वाद्य 'नगड़िया' को शामिल कर किसी ऊल-जलूल प्रस्तुति को भी नौटंकी का नाम देकर सरकारी इमदाद डकारने तक ही महदूद हैं। किंतु इन्ही के बीच यदा कदा जब नौटंकी-शैली पर आधारित 'देवी-आगमन' जैसी स्तरीय प्रस्तुति देखने को मिलती है तो न केवल सुखद अहसास होता है बल्कि आशा की किरण भी दिखाई पड़ती है कि शायद इस लुप्तप्राय विधा के भी दिन वास्तव में बहुरें। 
प्रयास रँगमण्डल लखनऊ की नौटंकी आधारित अवधी प्रस्तुति 'देवी-आगमन' में वो सब देखने को मिलता है जो इस विधा का वास्तविक अंग है। इसमें नौटंकी की विभिन्न गायन शैली - बहरे-तबील, मांड, लावणी , डेढ़ तुकी आदि सभी प्रचुर मात्रा में शामिल हैं। कथानक संवाद, वेशभूषा और परिवेश भी इस परमरागत शैली के साथ पूरा न्याय करते दिखाई पड़ते हैं।
नाटक की कहानी देवी देवताओं के नाम पर भोले भाले ग्रामीणों को ठगे जाने की कथा है। गांव सतवाखेड़ा का दबंग ठाकुर हरनाम सिंह अपने विश्वासपात्र सेवक गंगू के साथ मिलकर एक षड्यंत्र रचता है। वो पड़ोसी गाँव सुकुम्बी से माँ दुर्गा की मूर्ति ग़ायब करवा कर गंगू के ज़रिये उसे अपने खेत मे प्रकट करवा देता है। अंधविश्वासी ग्रामीण उसके झांसे में आ जाते हैं। देखते ही देखते वहाँ एक भव्य मंदिर बनने के साथ ही विशाल मेला लगना शुरू हो जाता है। मेले में सैकड़ो दुकानों, झूला, नौटंकी, जानवरों की बिक्री आदि पर कर की वसूली से उसे लाखों की आमदनी होने लगती है। मंदिर में भी सोना-चांदी और नकदी का भारी चढ़ावा आने लगता है। ये सब देख गंगू को लगता है भले ही योजना ठाकुर की थी लेकिन उसे अंजाम तो उसने ही दिया है। वो इस कमाई में हिस्सा माँगने ठाकुर के पास पँहुच जाता है, और हिस्सा न मिलने पर दबी जुबान इस राज को उजागर करने की बात कह देता है। शातिर ठाकुर का माथा ठनकता है। वो गंगू को इनाम का लालच देते अपनी बातों में फंसा उसका क़त्ल कर अपने षड्यंत्र के राज को सदा के लिये दफ़्न कर देता है।
इस प्रस्तुति में परंपरागत वाद्ययंत्रों का तो कहना ही क्या। 'हरमुनिया' (हारमोनियम) पर नगर के दिग्गज कलाकार निर्मल पाल और नगड़िया पर सिद्धहस्त कलाकर सिद्दीक, ढोलक पर मुन्ना खां की उंगलियों की चपलता देखते ही बनती है तो वहीं सूत्रधार की भूमिका में मंजे अभिनेता गुरुदत्त पांडेय की लाजवाब दमदार गायकी और गवैया की भूमिका में सिकन्दर यादव की गायकी मानों प्रस्तुति में चार चांद लगा देते हैं। प्रेम सागर गुप्ता और सुनील विश्वकर्मा का संगीत संयोजन भी सराहनीय है। अभिनेताओं की बात की जाय तो इस प्रस्तुति में जहाँ एक तरफ़ बरसों बरस की साधना कर तपे-पके कलाकार अरुण शंकर तिवारी, करुणा सागर, अनिल त्रिपाठी, सुधांशु सावंत, प्रभात मिश्रा, कादिर शेख़, अंजनी कुमार, ओम प्रकाश श्रीवास्तव, अशोक शुक्ला, सुरेश कुमार, अभ्युदय तिवारी, परमेश्वर रावत और रामकुमार जैसे सिद्धहस्त कलाकार प्रस्तुति में प्राण फूँकते दिखाई पड़ते हैं तो वहीं दूसरी तरफ अनिरुद्ध प्रकाश, अंबर गुप्ता, नमन पण्डिया, संतराम और प्रांजल गौड़ जैसे नवोदित ऊर्जावान कलाकार भी अपनी भूमिका के साथ न्याय करने में वरिष्ठ कलाकारों से ज़रा भी पीछे नही दिखाई पड़ते। प्रस्तुति का कथानक मुख्यतः दो पात्रों के इर्दगिर्द बुना गया है। ठाकुर हरनाम सिंह की भूमिका में अपनी कुटिल चाल के साथ गरजते बहुमुखी प्रतिभा के धनी दूरदर्शन के वरिष्ठ समाचार वाचक/कमेंट्रेटर रंगकर्मी अनिल त्रिपाठी और उनके विश्वासपात्र सेवक दीन-हीन गंगू की भूमिका में थियेटर को ही अपना जीवन समर्पित कर चुके वरिष्ठ अभिनेता रंगकर्मी करुणा सागर मानो पात्रों को मंच पर जीवंत कर देते हैं। 
मधुसूदन 'बाबा' का मंच निर्माण, आलोक अग्रवाल की प्रकाश व्यवस्था, दिनेश अवस्थी की रूप सज्जा, तारा गुप्ता और शिवानी अग्रवाल की वेषभूषा प्रस्तुति के लिए सोने पे सोहागा सरीखे रहे। ये सभी पक्ष कथानक के अनुरूप परिवेश-परिदृश्य गढ़ते प्रस्तुति को प्रभावशाली और स्तरीय बनाने में पूर्णतया सफल रहे।  ये सारा वृतांत न सिर्फ़ अधूरा बल्कि व्यर्थ साबित होगा अगर प्रस्तुति के निर्देशक और नाट्य रूपांतरकार वयोवृद्ध अभिनेता-रंगकर्मी अश्वनि 'मक्खन' का ज़िक्र न किया जाय। कामतानाथ जी की मूल कहानी का नाट्यरूपांतरण करते समय उन्होंने एक एक संवाद, एक एक गीत में नौटंकी शैली की बारीकियों का पूरा ख़याल रखा है। पूर्णतया शहरी परिवेश में पले बढ़े आधुनिक थियेटर से जुड़े सभी कलाकारों से उन्होंने जिस तरह से बहरे-तबील, मांड, लावणी , डेढ़ तुकी आदि का सफल गायन करवाते हुए संवाद अदायगी करवाई है वो आश्चर्य में डाल देता है। प्रत्येक दृश्य में मंझे निर्देशन की जो छाप दिखाई पड़ती है वो सहज ही अहसास करा देती है कि अपने दशकों के अनुभव को उन्होनें किस ख़ूबसूरती से इस प्रस्तुति में उड़ेला है। ताज़्जुब तो यह होता है कि नाट्य-क्षेत्र के पुरस्कार और सम्मान निर्धारित करने वाली संस्था-समितियों की निगाह आख़िर अश्वनि मक्खन जैसे समर्पित-वास्तविक रंगकर्मियों पर क्यों नहीं पड़ती ! क्या इसलिये कि चमक-धमक और लटके-झटके से दूर सामान्य जीवन जी रहे इन दिग्गजों को 'ठकुर-सुहाती' बतियाना, सत्तासीनों की शान में क़सीदे काढ़ना या मसनवी गढ़ना नहीं आता ! इस मौके पर प्रयास रँगमण्डल ने एक सराहनीय और अनुकरणीय शुरुआत करते हुये कला-जगत  को समर्पित विभूतियों को अलंकृत करने के लिये वरिष्ठ रंगकर्मी स्वर्गीय विजय तिवारी की स्मृति में 'विजय-श्री' सम्मान देने की घोषणा की। इस सम्मान की पहली कड़ी में 'विजयश्री-2020' के लिए वरिष्ठ रंगकर्मी/रँग प्रबंधक सिद्धार्थ पकरासी, 'विजयश्री-2021' के लिये वरिष्ठ रँग शिल्पकार मधु सूदन राव और 'विजयश्री-2022' के लिये सुप्रसिद्ध नृत्यांगना एवं अभिनेत्री डॉ.कुमकुम धर को सम्मानित किया गया। 
सुखद संयोग ये रहा कि नगर के प्रतिष्ठित सभागार रवींद्रालय में दशकों से बंद पड़े नाट्य-मंचन का सिलसिला भी 'देवी आगमन' की प्रस्तुति और 'विजय-श्री सम्मान' समारोह के ज़रिये पुनः प्रारंभ हुआ। अनेक नाट्य प्रेमियों के लिये जहाँ ये भावुकता के क्षण थे तो वहीं अपनी खचाखच भरी-पूरी दर्शक दीर्घा देख 'रवींद्रालय' भी झूमता-इतराता नज़र आया। बरसों बरस बाद रवींद्रालय में 'देवी आगमन' की प्रस्तुति एक ऐसा आयोजन रहा जिसे दर्शक लंबे समय तक भूल नहीं पायेंगे। प्रयास रँगमण्डल लखनऊ ने भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के सहयोग से इस प्रस्तुति को अंजाम दिया।

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