बैंकों को कर्ज बांटना है या लुटाना है?

राजनीती , 925

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केंद्र सरकार क्या कारोबारी बैंकों को कर्ज लुटाने की छूट दे रही है? केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बैंक अधिकारियों को कमाल का सुझाव दिया है। उन्होंने बैंक अधिकारियों से कहा है कि वे तीन सी यानी सीबीआई, सीवीसी और सीएजी की परवाह किए बगैर कर्ज बांटें। वित्त मंत्री ने आगे कहा कि कर्ज की सौ फीसदी गारंटी केंद्र सरकार की है और अगर कोई डिफॉल्ट होता है तो कर्ज देने वाले अधिकारी पर कोई कार्रवाई नहीं होगी। गौरतलब है कि वित्त मंत्री ने सूक्ष्म, लघु और मझोले उद्यमों यानी एमएसएमई के लिए तीन लाख करोड़ रुपए के कर्ज का प्रावधान किया है और जाहिर है कि वित्त मंत्री उन उद्यमों को कर्ज लेने के लिए प्रोत्साहित करने और बैंकों को आसानी से कर्ज देने के लिए प्रोत्साहित करने के मकसद से यह बात कही है।

पर यह बैंकों को कर्ज बांटने की नहीं कर्ज लुटाने की छूट है। अगर जिम्मेदारी तय नहीं की गई तो इस संकट के समय बैंक कर्ज लुटाने लगेंगे। यह सबको पता है कि जो सचमुच के कारोबारी हैं और बाजार के हालात समझ रहे हैं वे इस समय कर्ज लेने से बचेंगे। कम से कम तब तक जब तक बाजार के हालात सुधरते नहीं हैं। पर जिनको डिफॉल्ट करना है और जो संकट को अवसर मानते हैं वे कर्ज लेने की जल्दबाजी दिखाएंगे। सो, बैंकों को सोच समझ कर ही कर्ज बांटना चाहिए, चाहे उन्हें सीबीआई, सीवीसी और सीएजी से छूट दी जाए। वित्त मंत्री की यह बात इसलिए भी हैरान करने वाली है कि निगरानी करने वाली संस्थाओं से मुंहजबानी छूट देने की घोषणा कैसे की जा सकती है? या तो सरकार कानून बदल कर बैंकों को इन संस्थाओं की निगरानी से बाहर करे या इन संस्थाओं को अपना काम करने दे और बैंकों को अपना काम करने दे। इस तरह के बयान से निगरानी करने वाली संस्थाएं दबाव में आती हैं। मनमोहन सिंह ने भी प्रधानमंत्री रहते अधिकारियों को फैसले लेने के लिए प्रोत्साहित किया था पर निगरानी संस्थाओं से छूट देने की बात उन्होंने भी नहीं कही थी, जबकि उनकी सरकार नीतिगत पंगुता के आरोप झेल रही थी।

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