27 साल पुराने मामले में बबलू श्रीवास्तव उर्फ ओम प्रकाश श्रीवास्तव बरी
जनपत की खबर Nov 06, 2026 at 07:55 PM , 10CBI के विशेष न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत ने सुनाया फैसला, जेल से मोबाइल के जरिए गिरोह चलाने और धमकी देने के आरोपों में नहीं साबित हो सका जुर्म
लखनऊ, 6 नवंबर। इलाहाबाद की नैनी जेल से मोबाइल फोन के जरिए आपराधिक गतिविधियां संचालित करने और गिरोह के सदस्यों को धमकी भरे फोन करने के आरोपों से जुड़े करीब 27 साल पुराने मामले में ओम प्रकाश श्रीवास्तव उर्फ बबलू श्रीवास्तव को अदालत ने बरी कर दिया है। सीबीआई/प्रदूषण मामलों के विशेष न्यायिक मजिस्ट्रेट (SJM), लखनऊ की अदालत ने 6 नवंबर 2026 को फैसला सुनाते हुए आरोपी को सभी धाराओं में दोषमुक्त कर दिया।
यह मामला आरसी-2(S)/1999 और सीसी-208/2001 से संबंधित है। इसकी शुरुआत इलाहाबाद हाईकोर्ट के 1 फरवरी 1999 के आदेश के बाद हुई थी। हाईकोर्ट में दाखिल रिट याचिका संख्या 4235/1999 में आरोप लगाया गया था कि बाबू श्रीवास्तव नैनी जेल के भीतर से मोबाइल फोन का इस्तेमाल कर अपने गिरोह के सदस्यों से संपर्क करते थे और बाहर आपराधिक गतिविधियों को संचालित कर रहे थे। याचिका में जेल अधिकारियों पर भी उन्हें ऐसी सुविधाएं उपलब्ध कराने का आरोप लगाया गया था।
मामले की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट ने पूरी जांच सीबीआई को सौंपने का आदेश दिया था। इसके अनुपालन में सीबीआई ने कैंट थाना, इलाहाबाद में 14 दिसंबर 1998 को दर्ज एफआईआर संख्या 489/98 की जांच अपने हाथ में ली। यह एफआईआर धीरेंद्र कुमार श्रीवास्तव की शिकायत पर आईपीसी की धारा 420, 467, 468, 352, 504, 506 और 120-बी के तहत दर्ज की गई थी।
सीबीआई ने 9 अक्टूबर 2001 को ओम प्रकाश श्रीवास्तव के खिलाफ आईपीसी की धारा 385, 387 और 506 के तहत आरोपपत्र दाखिल किया था। अदालत ने 13 अक्टूबर 2003 को इन धाराओं में आरोप तय किए थे। लंबी सुनवाई और मुकदमे के विचारण के बाद अदालत ने 6 नवंबर 2026 को आरोपी को सभी आरोपों से बरी कर दिया।
अभियोजन के सामने साक्ष्य साबित करने की चुनौती
मामले में उपलब्ध जानकारी के अनुसार, आरोपी के पास से जेल में कोई मोबाइल फोन या सिम कार्ड बरामद नहीं हुआ था। धमकी भरी कॉल के संबंध में कोई वॉयस सैंपल या विशेषज्ञ की रिपोर्ट भी उपलब्ध नहीं थी। गवाह भी यह पहचान नहीं कर सके कि धमकी देने वाला व्यक्ति आरोपी ही था। इसके अलावा कई गवाह अपने पूर्व बयानों से मुकर गए, जबकि कुछ गवाहों की मृत्यु हो गई या लंबे समय के अंतराल के कारण उनका पता नहीं चल सका।
फिलहाल ये संभावित कारण हैं। अदालत के विस्तृत फैसले और दोषमुक्ति के वास्तविक आधारों की पुष्टि प्रमाणित प्रति मिलने के बाद ही हो सकेगी।






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