**जब कालकोठरी में मुस्कुराया अंधकार, समझो युगपुरुष आने वाला है...**

जनपत की खबर , 13

**जंजीरों में बंधे वसुदेव-देवकी के हृदय में पहली बार भय नहीं, विश्वास था—‘वह आ रहा है...’**
 
*लेखक — राकेश पाण्डेय “निश्छल”*
 
उस कालकोठरी तक कभी सूर्य का प्रकाश नहीं पहुँचा था। वहाँ अंधकार केवल दीवारों पर नहीं था, बल्कि जैसे हर सांस पर पहरा देता था। लोहे की जंजीरों में बंधे वसुदेव और देवकी के जीवन में वर्षों से भय ही सबसे बड़ा सत्य था।
 
बंदीगृह की सुरक्षा में लगे प्रहरी इतने कठोर और भयावह थे कि उन्हें देखकर निर्बल व्यक्ति का साहस भी जवाब दे जाए। उनके हाथों में शस्त्र थे, आँखों में क्रूरता और चेहरे पर ऐसी कठोरता, जैसे करुणा नाम की कोई वस्तु उन्होंने कभी देखी ही न हो।
 
लेकिन उस रात...
 
**कुछ बदल गया था।**
 
कभी न मुस्कुराने वाले वे प्रहरी अचानक मुस्कुरा उठे।
 
वे स्वयं भी नहीं समझ पा रहे थे कि उनके भीतर यह परिवर्तन कहाँ से आया। बार-बार देवकी के पास जाते और बड़े अपनत्व से कहते—
 
**“माँ! कोई आवश्यकता हो तो हमें आदेश करना। हम आपकी सेवा के लिए ही नियुक्त हैं।”**
 
जिस स्थान पर भय पहरा देता था, वहाँ अचानक ममता के शब्द सुनाई देने लगे।
 
देवकी को आश्चर्य होना चाहिए था। उन्हें भयभीत होना चाहिए था। लेकिन उनके चेहरे पर भी आश्चर्य नहीं था।
 
उनके अधरों पर एक ऐसी मुस्कान थी, जिसमें वर्षों के आँसुओं के बाद जन्मा विश्वास छिपा था।
 
यह वही देवकी थीं, जिन्होंने अपनी छह संतानों को जन्म लेते और फिर कंस के हाथों मृत्यु के मुख में जाते देखा था। हर प्रसव उनके लिए मातृत्व का उत्सव नहीं, मृत्यु की प्रतीक्षा बन जाता था।
 
लेकिन इस बार...
 
**कुछ अलग था।**
 
यह आठवाँ गर्भ था।
 
प्रसव का समय निकट था, फिर भी देवकी का हृदय पहली बार भय से नहीं काँप रहा था। पहली बार उन्हें लग रहा था कि उनके गर्भ में पल रहा शिशु केवल उनका पुत्र नहीं है।
 
**वह किसी बड़े प्रयोजन के लिए आने वाला है।**
 
उधर मथुरा के राजमहल में बेचैनी बढ़ती जा रही थी।
 
जिस आकाशवाणी ने कंस के भीतर भय का बीज बोया था, वही भय अब वृक्ष बन चुका था।
 
जिसने छह निर्दोष नवजात शिशुओं की हत्या कर दी थी, वही कंस अब अपने अंत की प्रतीक्षा कर रहा था।
 
उसका मन जैसे बार-बार उससे कह रहा था—
 
**“कंस! तुम उसे नहीं मार सकते। तुम्हारा अंत उसी के हाथों लिखा है।”**
 
लेकिन अहंकार मनुष्य को सत्य स्वीकार करने कहाँ देता है?
 
कंस आकाशवाणी पर विश्वास करता था, तभी तो उसने देवकी की संतानों को मार डाला। फिर भी उसी आकाशवाणी को असत्य सिद्ध करने के लिए वह लगातार प्रयास करता रहा।
 
यही मनुष्य के अहंकार की सबसे बड़ी विडंबना है—
 
**वह नियति को जानता है, फिर भी नियति से लड़ता है।**
 
जिस भय से देवकी और वसुदेव वर्षों तक काँपते रहे, वह भय अब स्थान बदल चुका था।
 
**डर अब कालकोठरी में नहीं था। डर कंस के महल में था।**
 
देवकी के भीतर अब एक अद्भुत विश्वास जन्म ले चुका था।
 
माँ को विश्वास हो गया था—
 
**यदि उसका पुत्र युगपुरुष है, तो अपनी राह वह स्वयं बनाएगा।**
 
जब वह आएगा, तो धरती उसके स्वागत में झूमेगी। आकाश उसके आने की घोषणा करेगा। हवाएँ उसकी राह बुहारेंगी। बादल धरती को धोकर निर्मल करेंगे। पक्षी मंगलगान करेंगे। और सृष्टि का कण-कण उसके स्वागत में दीप बन जाएगा।
 
क्योंकि महानायक के जन्म से पहले केवल महानायक का जन्म नहीं होता...
 
**उसकी माँ के हृदय में उसके महान होने का विश्वास भी जन्म लेता है।**
 
भाद्रपद का वही महीना, जिसकी घनघोर वर्षा सदियों से गृहस्थों को चिंतित करती रही है, उस रात एक चिर-उदास दंपती के हृदय में शांति लेकर आया था।
 
बाहर मेघ गरज रहे थे। बिजलियाँ चमक रही थीं। वर्षा अपनी पूरी शक्ति से बरस रही थी।
 
और भीतर...
 
दो बंदी शांत थे।
 
हाथों में जंजीरें थीं, पर मन स्वतंत्र था। चारों ओर अंधकार था, पर हृदय में प्रकाश था। सामने कंस की सत्ता थी, पर भीतर किसी अदृश्य शक्ति का विश्वास था।
 
उनके पास न सेना थी, न शस्त्र।
 
उनके पास केवल एक विश्वास था—
 
### **“वह आ रहा है...”**
 
और शायद इतिहास में बड़े परिवर्तन ऐसे ही जन्म लेते हैं।
 
जब अंधकार सबसे घना हो, तब प्रकाश आने वाला होता है। जब अत्याचार अपनी सीमा पर पहुँच जाए, तब प्रतिरोध जन्म लेता है। जब भय अपने चरम पर हो, तब विश्वास किसी चमत्कार की तरह हृदय में उतरता है।
 
उस रात मथुरा की उस अंधेरी कालकोठरी में केवल एक बालक जन्म लेने वाला नहीं था...
 
### **एक युग जन्म लेने वाला था।**
 
कंस के महल में भय था और कालकोठरी में विश्वास।
 
एक ओर सत्ता काँप रही थी, दूसरी ओर जंजीरों में बंधे माता-पिता मुस्कुरा रहे थे।
 
क्योंकि उन्हें पता था—
 
**जिसके आने की प्रतीक्षा में स्वयं समय ठहर जाए, उसे कोई कारागार रोक नहीं सकता।**
 
और उस रात देवकी और वसुदेव ने मान लिया था—
 
# **“वह आ रहा है...”**

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